बेंगलुरु जैसे महानगर में ज़िंदगी कितनी चुनौतीपूर्ण हो सकती है, इसका अंदाज़ा निकिता नाम की एक महिला की वायरल कहानी से लगाया जा सकता है. पिछले सात महीनों से बेरोज़गार चल रहीं 30 वर्षीय निकिता ने जब अपने एक महीने के खर्चों का पूरा ब्योरा सोशल मीडिया पर साझा किया, तो यह मामला इंटरनेट पर चर्चा का विषय बन गया. जहां एक वर्ग ने उनके खर्चों पर सवाल उठाए, वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने इसे शहरी भारत के युवाओं की कड़वी हकीकत बताया.
ऐसी उम्र में जब समाज व्यक्ति से करियर के शिखर पर होने की अपेक्षा करता है, निकिता अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरतों के लिए अपनी मां से हर महीने 30,000 रुपए उधार ले रही हैं. उन्होंने खुद स्वीकार किया कि इस उम्र में माता-पिता से आर्थिक मदद लेना उन्हें मानसिक रूप से अच्छा नहीं लगता. हालांकि, उन्होंने इसे एक अस्थायी 'लोन' बताया है, जिसे नौकरी मिलने के बाद लौटाने का इरादा है.
किराया और ज़रूरी बिल, सबसे बड़ा बोझ
बेंगलुरु जैसे आईटी हब में रहना सस्ता नहीं है. निकिता के मासिक खर्चों में सबसे बड़ा हिस्सा घर के किराए का है, जो करीब 13,000 रुपए है. इसके अलावा बिजली, पानी, गैस, वाई-फाई और मोबाइल रिचार्ज जैसे ज़रूरी बिल बजट को और तंग कर देते हैं. बिना किसी नियमित आय के इन अनिवार्य खर्चों को संभालना उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है.
जनवरी महीने में निकिता ने राशन और कभी-कभार बाहर खाने पर कुल 8,402 रुपए खर्च किए. वहीं शहर में आने-जाने और अन्य छोटे-मोटे कामों पर 4,284 रुपए अलग से खर्च हुए. सोशल मीडिया पर कुछ लोगों को यह रकम ज़्यादा लगी, लेकिन बेंगलुरु की महंगाई के संदर्भ में यह खर्च सामान्य ही माना जा सकता है.
सेल्फ-केयर पर उठे सवाल
निकिता के वीडियो का सबसे विवादित हिस्सा उनका 'सेल्फ-केयर' बजट रहा. उन्होंने फेशियल, वैक्सिंग और मसाज जैसी सेवाओं पर लगभग 5,000 रुपए खर्च किए, जिस पर कई यूज़र्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी. आलोचकों का कहना था कि बेरोज़गारी के दौर में ऐसे खर्च गैर-ज़रूरी हैं. वहीं निकिता का तर्क था कि मानसिक संतुलन बनाए रखने और खुद को आत्मविश्वास के साथ प्रस्तुत करने के लिए यह उनके लिए अहम है.
सिर्फ एक कहानी नहीं, एक पीढ़ी की आवाज़
पिछले सात महीनों में अपने खर्च पूरे करने के लिए निकिता ने मां से उधार लेने के साथ-साथ अपने इन्वेस्टमेंट फंड से पैसे निकाले और लिंक्डइन पर कंसल्टिंग के ज़रिए कुछ आय भी की. उनकी कहानी सिर्फ एक महिला के संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उन हजारों युवाओं की वास्तविकता को उजागर करती है, जो महंगे शहरों में मंदी और बेरोज़गारी के दौर में परिवार और बचत के सहारे जीवन गुज़ार रहे हैं.