हिंदू धर्म में ऐसा माना जाता है कि भले ही किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है लेकिन आत्मा अमर है. किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद आत्मा का नया सफर शुरू हो जाता है. गरुड़ पुराण में बताया गया है कि आत्मा का क्या होता है. अधिकांश लोग यह सोचते हैं कि किसी व्यक्ति की मृत्यु होने के बाद आत्मा तुरंत स्वर्ग या नर्क चली जाती है लेकिन गरुण पुराण के मुताबिक ऐसा नहीं होता है. किसी व्यक्ति की मौत के बाद आत्मा शरीर से बाहर निकलकर 13 दिनों तक अपने ही घर में अपने परिवार वालों के बीच रहती है.
यमलोक से यमदूत आते हैं आत्मा को लेने
गरुड़ पुराण के मुताबिक किसी व्यक्ति की मौत के बाद तुरंत यमलोक से दो यमदूत आत्मा को लेने के लिए आ जाते हैं. यमदूत आत्मा को अपने संग लेकर यमलोक चले जाते हैं. गरुण पुराण के मुताबिक आत्मा को यमलोक ले जाने का उद्देश्य महज इतना ही होता है कि उसे उसके जीवनभर के अच्छे और बुरे कर्मों का हिसाब-किताब दिखाया जा सके. यमराज के दरबार में आत्मा को उसके कर्मों की झलक दिखाई जाती है. इसके बाद यमदूत आत्मा को वापस उसी के घर पर छोड़ देते हैं, जहां वह रहती थी. आत्मा को यमलोक ले जाने और उसके कर्मों की झलक दिखाने में लगभग 24 घंटे यानी एक दिन का समय लग जाता है. आत्मा को इसके बाद अगले 13 दिनों तक अपने परिवार के बीच रहना पड़ता है.
अपनो के बीच घर में क्या करती है आत्मा
गरुड़ पुराण के मुताबिक आत्मा जब यमलोक से अपने घर आती है तो उसे अपने परिवार और अपनी चीजों से लगाव अधिक महसूस होने लगता है. वह दूर से अपने मृत पड़े शरीर को देखती है और घरवालों को भी रोते हुए पाती है. इससे आत्मा परेशान हो जाती है. वह अपने घरवालों को चुप कराने की कोशिश करती है, उनसे बात करना चाहती है और उन्हें आवाज भी देती है. हालांकि वह पूरी तरह से हवा जैसी एनर्जी बन चुकी होती है. ऐसे में कोई भी आत्मा को देख या फिर सुन नहीं सकता है. कई बार आत्मा अपने पुराने शरीर के अंदर घुसने की कोशिश भी करती है, लेकिन नियमों की वजह से वह अपने शरीर में वापस नहीं जा पाती.
ऐसे आत्मा की भूख और प्यास होती है शांत
शरीर से निकलने के बाद आत्मा खुद को बहुत कमजोर महसूस करती है. उसे भूख और प्यास भी लगती है. गरुड़ पुराण के मुताबिक मौत के बाद के पहले 10 दिनों तक घर के लोग जो पिंडदान यानी चावल या जौ के आटे से बने गोल लड्डू का दान करते हैं, वह आत्मा के लिए काफी जरूरी होता है. रोज पिंडदान किया जाता है, उससे आत्मा की भूख व प्यास शांत होती है. इसी पिंडदान की ताकत से आत्मा को एक नया अदृश्य शरीर मिलता है, ताकि वह आगे का सफर तय कर सके. रोज के पिंडदान से इस नए शरीर के अलग-अलग हिस्से बनते हैं, जिससे आत्मा को आगे की यात्रा के लिए ताकत मिलती है.
आत्मा के नए अदृश्य शरीर को मिलती है ताकत
किसी व्यक्ति के मरने के 11वें और 12वें दिन घर में जो खास पूजा-पाठ और पिंडदान किए जाते हैं, वे आत्मा के अदृश्य शरीर को मजबूत और स्थिर बनाते हैं. इन दो दिनों में परिवार के लोग जो प्रार्थना करते हैं, उससे आत्मा को बहुत शांति मिलती है. आत्मा को यह अहसास हो जाता है कि अब उसका इस दुनिया का सफर पूरी तरह से खत्म हो चुका है और उसे आगे बढ़ना ही होगा. इन दिनों की पूजा से आत्मा को वह ताकत मिलती है जिससे वह पृथ्वी लोक को छोड़कर यमलोक के कठिन रास्ते पर आसानी से चल सके.
इस तरह से आत्मा की होती है अंतिम विदाई
आत्मा के लिए 13वां दिन विशेष होता है. इस दिन को तेरहवीं भी कहते हैं. तेरहवीं के दिन घर पर विशेष पूजा-पाठ होती है, पंडितों को भोजन कराया जाता है और गरीबों को दान दिया जाता है. गरुड़ पुराण के मुताबिक तेरहवीं के दिन जो भी चीजें दान की जाती हैं, उनका फायदा सीधे तौर पर आत्मा को यमलोक के सफर में भोजन, पानी और रास्ते की सुख-सुविधाओं के रूप में प्राप्त होता है. तेरहवीं की पूरी प्रक्रिया पूरी होते ही यमदूत दोबारा आते हैं. गरुण पुराण के मुताबिक इसके बाद आत्मा का धरती और अपने परिवार से नाता हमेशा के लिए टूट जाता है. आत्मा यमलोक की यात्रा पर निकल पड़ती है. इस यात्रा को पूरा करने में आत्मा को लगभग एक साल का समय लग जाता है.