Ear Piercing Tradition: कान छिदवाने के क्या-क्या फायदे हैं? जानें धार्मिक महत्व

हिंदू धर्म में जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव को संस्कारों के जरिए विशेष महत्व दिया जाता है. इन्हीं में से एक है कर्णवेध संस्कार, यानी कान छेदन की परंपरा.

ear piercing
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 12 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 12:39 PM IST

हिंदू धर्म में जीवन के हर महत्वपूर्ण पड़ाव को संस्कारों के जरिए विशेष महत्व दिया जाता है. इन्हीं में से एक है कर्णवेध संस्कार, यानी कान छेदन की परंपरा. यह सिर्फ एक सांस्कृतिक रस्म नहीं, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक, आध्यात्मिक और स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यताएं भी हैं. आज भी देशभर में यह परंपरा बड़े उत्साह और श्रद्धा के साथ निभाई जाती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर कान छेदन क्यों किया जाता है? अगर नहीं तो चलिए हम आपको बताते हैं.

आध्यात्मिक महत्व
कर्णवेध शब्द संस्कृत के दो शब्दों ‘कर्ण’ यानी कान और ‘वेध’ यानी छेदन से मिलकर बना है. हिंदू मान्यता के अनुसार कान ज्ञान प्राप्ति का मुख्य माध्यम हैं. वेदों में ध्वनि को ज्ञान का आधार माना गया है. इसलिए कान छेदन को व्यक्ति के 'अंतर कान' खोलने और दिव्य ध्वनियों को ग्रहण करने की प्रक्रिया से जोड़ा जाता है. धर्मशास्त्रों जैसे मनुस्मृति और गृह्यसूत्रों में भी इस संस्कार का उल्लेख मिलता है.

कब किया जाता है संस्कार
परंपरागत रूप से कर्णवेध संस्कार बच्चे के जन्म के 6वें या 7वें महीने में किया जाता है. कई परिवारों में इसे 3, 5 या 7 साल की उम्र में भी किया जाता है. लड़कों का दायां कान पहले और लड़कियों का बायां कान पहले छेदा जाता है. यह प्रक्रिया शुभ मुहूर्त में, अक्सर पूर्व दिशा की ओर मुख करके की जाती है ताकि सूर्य देव का आशीर्वाद प्राप्त हो.

स्वास्थ्य से जुड़ी मान्यताएं
आयुर्वेद के अनुसार कान की लोब में कई महत्वपूर्ण एक्यूप्रेशर बिंदु होते हैं. इन्हें छेदने से मस्तिष्क के विकास में मदद मिलती है. साथ ही यह दृष्टि, सुनने की क्षमता और मानसिक संतुलन को बेहतर बनाने में सहायक माना जाता है. कुछ मान्यताओं के अनुसार यह चिंता और घबराहट जैसी समस्याओं को कम करने में भी मदद करता है.

आज भी जीवित है परंपरा
भारत के अलग-अलग हिस्सों में कर्णवेध संस्कार आज भी प्रचलित है. उत्तर भारत में यह संस्कार पंडित द्वारा कराया जाता है, जबकि दक्षिण भारत में इसे बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है. कई जगह इसे मुंडन संस्कार के साथ भी जोड़ा जाता है. यह परंपरा आज भी लोगों को अपनी जड़ों और संस्कृति से जोड़े रखती है.

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