लाखों लोग नहीं जानते ये बात, एसी-कूलर का काम करता है घर लेपना.. दीवारें बनती हैं मजबूत, घर की उम्र में होता है इजाफा

अक्सर गांव में देखा जाता है कि लोग कच्चे घर के फर्श और दीवारों पर मिट्टी, भूसे और गोबर को लेप लगाते हैं. कुछ लोग सोचते हैं कि शायद यह सिर्फ इसलिए होता है क्योंकि यह परंपरा काफी समय से चली आ रही है. लेकिन इसके पीछे कुछ वैज्ञानिक कारण भी है.

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gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 03 जुलाई 2026,
  • अपडेटेड 4:16 PM IST

मौजूदा समय में में ज्यादातर घरों की दीवारों पर पेंट और फर्श पर टाइल्स या मार्बल बिछे होते हैं. लेकिन काफी समय पहले गांवों और कच्चे घरों में मिट्टी, गोबर और भूसे का लेप लगाना एक आम बात हुआ करती थी. कुछ लोग समझते हैं कि यह केवल एक परंपरा थी, जबकि यह घर को आरामदायक बनाने का एक तरीका भी था. आज भी यह तरीका कई गांवों अपनाया जाता है. इसके पीछे दो वजह हैं, पहली तो यह सस्ता है और दूसरा यह नेचर से जुड़ा होता है. लेकिन घरों को लेपने के पीछे के फायदे क्या थे, चलिए वो आपको बताते हैं,

गर्मी और सर्दी दोनों में मिलता है आराम

मिट्टी और गोबर से घर को लेपने का फायदा होता था कि घर में इंसुलेशन बनी रहती थी. यह तरीका गर्मियों में बाहर की तेज धूप और गर्मी को काफी हद तक अंदर आने से रोकता था, जिससे घर ठंडा महसूस होता था. वहीं सर्दियों में यही परत घर के अंदर की गर्माहट को लंबे समय तक बनाए रखने में मदद करती थी. ऐसे में एसी-कूलर और हीटर की जरूरत नहीं पड़ती थी.

दीवारों को मजबूत रखने का सस्ता उपाय

कच्चे घरों की दीवारों में समय के साथ छोटी-छोटी दरारें आ जाती थीं. जब घर की लिपाई की जाती थी, तो मिट्टी, गोबर और भूसे का लेप इन दरारों को भर देता था. इससे दीवारें दोबारा मजबूत बन जाती थीं और जल्दी खराब नहीं होती थीं. लगातार लिपाई करने से घर की उम्र भी बढ़ जाती थी और बार-बार मरम्मत की जरूरत नहीं पड़ती थी.

सफाई के तरीके में आसानी

मिट्टी के फर्श पर चलने से धूल उड़ना आम बात थी. लिपाई करने के बाद फर्श की सतह पहले से ज्यादा चिकनी और मजबूत हो जाती थी. इससे धूल कम उड़ती थी और घर साफ दिखाई देता था. यही वजह थी कि रोज की सफाई करना भी आसान हो जाता था, क्यों झाड़ू लगाते समय धूल कम उड़ती थी और परेशानी कम होती थी. और घर में रहने का माहौल बेहतर रहता था.

नेचर से मिलता है फ्री में

गोबर, मिट्टी और भूसा पूरी तरह नेचुरल चीजें हैं. ये आसानी से गांवों में मिल जाती थीं और इन्हें इस्तेमाल करने से किसी तरह का केमिकल पॉल्यूशन नहीं फैलता था. यही वजह है कि यह तरीका पर्यावरण के लिए भी सेफ माना जाता था. साथ ही इसमें बहुत कम खर्च आता था, इसलिए हर परिवार इसे आसानी से अपना सकता था.

बेशक आज के समय में गांव में पक्के मकान मौजूद है, लेकिन कच्चे मकान पूरी तरह से गायब नहीं हुए हैं. ऐसे में आज भी इस तरह से घर को लेपने का तरीका अपनाया जाता है, जो सर्दी और गर्मी में काफी ज्यादा काम आता है. 

 

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