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31 साल वर्दी में देश की रक्षा, अब हर सावन हजारों कांवड़ियों की सेवा में जुटा पूरा परिवार... पेंशन से चलाता है अनोखा कांवड़ भंडारा

देश की सुरक्षा में 31 साल बिताने के बाद पूर्व CISF जवान राजकुमार राणा अब शिवभक्तों की सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म मानते हैं. मुजफ्फरनगर-बड़ौत मार्ग पर दाहा गांव में उनका घर हर साल कांवड़ यात्रा के दौरान सेवा का केंद्र बन जाता है.

kawad seva by an ex Army man
मनुदेव उपाध्याय
  • बाघपत,
  • 06 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 2:04 PM IST

देश की सुरक्षा में 31 साल बिताने के बाद पूर्व CISF जवान राजकुमार राणा अब शिवभक्तों की सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म मानते हैं. मुजफ्फरनगर-बड़ौत मार्ग पर दाहा गांव में उनका घर हर साल कांवड़ यात्रा के दौरान सेवा का केंद्र बन जाता है. यहां किसी संस्था या दानदाता का सहारा नहीं, बल्कि उनकी पेंशन और पूरे परिवार की मेहनत से हजारों कांवड़ियों के लिए भोजन तैयार किया जाता है. यही सादगी और समर्पण इस शिविर को सबसे अलग बनाता है.

मुजफ्फरनगर-बड़ौत मार्ग पर दाहा गांव से गुजरने वाले कांवड़ियों के लिए पूर्व CISF जवान राजकुमार राणा कई वर्षों से अपने घर के बाहर कांवड़ सेवा शिविर लगा रहे हैं. इस शिविर की खास बात यह है कि इसे किसी समिति, संगठन या बाहरी सहयोग से नहीं चलाया जाता. पूरा खर्च राजकुमार राणा अपनी पेंशन से उठाते हैं और परिवार का हर सदस्य इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेता है.

कांवड़ियों को थाली सेवा
इस शिविर में भोजन बनाने के लिए कोई हलवाई नहीं रखा गया है. राजकुमार राणा की पत्नी खुद सब्जियां तैयार करती हैं और रोटियां बेलती हैं, जबकि राजकुमार राणा तंदूर पर रोटियां सेंकते हैं. परिवार के अन्य सदस्य भी अपनी-अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं. भंडारे में इस्तेमाल होने वाला दूध और कई तरह की सब्जियां उनके अपने घर और खेत की होती हैं. यानी खेत से लेकर कांवड़ियों की थाली तक सेवा का पूरा काम परिवार खुद करता है.

राजकुमार राणा ने करीब 31 साल तक CISF में रहकर देश की सेवा की. रिटायरमेंट के बाद जब उन्होंने अपने घर के सामने से गुजरने वाले हजारों कांवड़ियों की थकान और जरूरत को देखा तो उनके मन में सेवा का भाव जागा. इसके बाद उन्होंने अपने घर के बाहर कांवड़ शिविर शुरू किया, जो आज परिवार की परंपरा बन चुका है. कभी वर्दी पहनकर देश की सुरक्षा करने वाले राजकुमार राणा आज शिव भक्तों के लिए भोजन बनाकर और अपने हाथों से रोटियां सेंक कर सेवा कर रहे हैं.

सेवा के साथ बेटियों के प्रति भी मिसाल
राजकुमार राणा की पहचान सिर्फ कांवड़ सेवा तक सीमित नहीं है. उनका एक बेटा और एक बेटी है, लेकिन उन्होंने एक अनाथ बच्ची को भी बेटी की तरह अपनाया, जिसके माता-पिता की हत्या हो गई थी. इसके अलावा वह अपने भाई की बेटी की परवरिश की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं. किसी गरीब परिवार में बेटी की शादी की जानकारी मिलने पर वह वहां पहुंचकर अपनी क्षमता के अनुसार कन्यादान में भी सहयोग करते हैं.

राजकुमार राणा की बेटी अंजनी बताती हैं कि बचपन से उन्होंने अपने पिता को लोगों की निस्वार्थ सेवा करते देखा है. यही संस्कार उन्हें भी मिले हैं. शादी के बाद भी वह हर साल कांवड़ यात्रा के दौरान अपने ससुराल से मायके लौटती हैं और पिता के साथ शिविर में सेवा करती हैं. उनके लिए यह केवल परंपरा नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी सीख और जिम्मेदारी है.

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