शिव जी आदि-अनादि और अनंत हैं. उन्हें संहार का अधिपति कहा जाता है, पर वे सृजन और पालन का कारण भी हैं. शिव जी आशुतोष हैं और बहुत जल्दी भक्तों की कामना पूरी करते हैं. महादेव के मंत्र अगर सामान्य रूप से भी जपे जाएं तो कल्याण होता है. विधिपूर्वक जप करने से किसी भी तरह की कामना पूरी की जा सकती है. शिव जी के मंत्र का जप रुद्राक्ष की माला से करना उत्तम होगा. मंत्र जप अगर प्रदोष काल में किया जाय तो सर्वोत्तम होगा. मंत्र जप करने के पहले शिव जी के कल्याणसुंदरम स्वरुप का ध्यान करना चाहिए. शिव जी के मंत्रों से किसी को नुकसान पंहुचाने का प्रयास न करें.
शिव जी की स्तुतियों का क्या है महत्व
शिव जी की स्तुतियां अत्यंत विशेष मानी जाती हैं. उनकी स्तुतियां सामान्यतः छंदात्मक हैं. अलग-अलग स्वरूपों के लिए उनकी अलग-अलग स्तुतियों की रचना की गई है. विशेष स्थितियों में इनकी स्तुतियों का प्रभाव अचूक होता है. हर स्तुति के पाठ के पूर्व उससे संबंधित स्वरुप का ध्यान कर लेना चाहिए.
भगवान शंकर के पंचाक्षरी मंत्र
शिव जी का पंचाक्षरी मंत्र है- नमः शिवाय. यह पांच तत्वों की शक्ति से भरा हुआ है. इस मंत्र के निरंतर जप से शिव कृपा अवश्य मिलती है. इसी मंत्र का षडाक्षर स्वरुप है- ॐ नमः शिवाय. जन कल्याण या दूसरों के कल्याण के निमित्त इस मंत्र को पढ़ना चाहिए.
शिव जी का महामृत्युंजय मंत्र
इस मंत्र का जप असाध्य रोगों से मुक्ति और अच्छे स्वास्थ्य के लिए किया जाता है. इस मंत्र में महामृत्युंजय स्वरुप में भगवान शिव, अमृत का कलश लेकर भक्त की रक्षा करते हैं. इस मंत्र का लघु चतुराक्षरी स्वरुप है- ॐ हौं जूं सः इसका जप निरंतर किया जा सकता है. मृत संजीवनी महामृत्युंजय मन्त्र है- ॐ ह्रौं जूं सः, ॐ भूर्भवः स्वः, ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् , उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात, स्वः भुवः भूः ॐ, सः जूं ह्रौं ॐ. जब मृत्यु जैसी स्थिति हो, तब इस मंत्र का प्रयोग किया जाता है.
शिव तांडव स्रोत
शिव तांडव स्रोत भगवान शिव के परम भक्त रावण द्वारा की गई एक विशेष स्तुति है. यह स्तुति छन्दात्मक है और इसमें बहुत सारे अलंकार हैं. किसी भी कठिनतम स्थिति में इस स्रोत का पाठ किया जा सकता है. अशुभ ग्रहों की दशा में इसका पाठ विशेष लाभकारी होता है. यदि नृत्य के साथ इसका पाठ करें तो सर्वोत्तम होगा. पाठ के बाद शिव जी का ध्यान करें और अपनी प्रार्थना करें.
दारिद्रय दहन स्रोत
यह स्रोत महर्षि वशिष्ठ द्वारा रचित है. इसका पाठ करने से दरिद्रता का नाश होता है. यदि आर्थिक स्थिति खराब हो तो इसका पाठ अवश्य करें. इसका पाठ दोनों वेला करना चाहिए. इसके पाठ के साथ सात्विकता बनाए रखना जरूरी है.