जहां माघ मेला और महाकुंभ के दौरान ज्यादातर पंडाल हर साल लगते और उखड़ जाते हैं, वहीं यह पंडाल साल भर खड़ा रहता है. बाढ़ के महीनों में जब संगम क्षेत्र का बड़ा हिस्सा पानी से घिर जाता है, तब भी यह पंडाल तपस्वी की तरह अडिग रहता है... मानो आस्था ने इसे जमीन में नहीं, विश्वास में रोप दिया हो
20 फीट ऊंची कुटिया पंडाल की सबसे बड़ी पहचान
पंडाल की सबसे बड़ी पहचान है इसकी 20 फीट ऊंची कुटिया. इस कुटिया में देवरहा बाबा और भगवान का छोटा-सा मंदिर स्थापित है. यहीं महंत रामदास प्रतिदिन पूजा-पाठ करते हैं. सादगी और साधना का यह संगम श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है. कुटिया के भीतर न कोई सजावट है, न दिखावा... बस मौन, मंत्र और ध्यान की शांति
चार मंजिला इमारत जितनी ऊंची अखंड ज्योति
लेकिन जो चीज इस पंडाल को सचमुच तिलिस्मी बनाती है, वह है कुटिया के ठीक बगल में जलती हुई चार मंजिला इमारत जितनी ऊंची अखंड ज्योति. यह ज्योति बीते 20 वर्षों से लगातार प्रज्ज्वलित है. न इसे छुआ जाता है, न इसकी पूजा की जाती है. यही कारण है कि इसकी संरचना और डिजाइन भी अलग है, ताकि लौ निर्बाध जलती रहे. यह ज्योति देश की सुख-समृद्धि और कल्याण की कामना के लिए जलाई गई थी. और तब से आज तक बिना रुके जल रही है
साधना का प्रतीक है यह पंडाल
महंत रामदास बताते हैं कि यह पंडाल साधना का प्रतीक है. देवरहा बाबा की परंपरा में दिखावे से दूर रहकर तप और सेवा को प्राथमिकता दी जाती है. यहां आने वाले श्रद्धालु शांति महसूस करते हैं. पंडाल में निरंतर भंडारा भी चलता रहता है, जहां सभी को समानता के भाव के साथ भोजन कराया जाता है. यह सेवा भाव ही इस स्थान की आत्मा है.