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Gayaji Pitrupaksha Mela 2026 Starts: गयाजी में 15 दिवसीय विश्वप्रसिद्ध पितृपक्ष मेला शुरू; विष्णुपद देवघाट पर उमड़ी पिंडदानियों की भारी भीड़

मोक्ष की भूमि गयाजी में 15 दिवसीय ऐतिहासिक पितृपक्ष मेला 2026 का आगाज हो गया है. देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु विष्णुपद क्षेत्र और फल्गु नदी तट (देवघाट) पर अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए पिंडदान कर रहे हैं.

गया में पिंड दान शुरू
पंकज कुमार
  • गया,
  • 26 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:20 PM IST

पितरों की मोक्ष भूमि माने जाने वाले गयाजी में ऐतिहासिक 15 दिनों तक चलने वाले पितृपक्ष मेले की शुरुआत हो गई है. मेले के पहले दिन ही देश के अलग-अलग हिस्सों से तीर्थयात्री यहां पहुंचने लगे हैं. विष्णुपद क्षेत्र के देवघाट पर श्रद्धालु अपने मृत पूर्वजों के लिए पिंडदान, तर्पण और श्राद्ध कर्म कर रहे हैं. गयाजी में चलने वाले इस पितृपक्ष मेले के दौरान कोई बेटा, कोई बेटी तो कोई माता-पिता और अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना लेकर पिंडदान करने पहुंच रहा है. हिंदू धार्मिक ग्रंथों में ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष मेले की 15 दिनों की अवधि में गयाजी में पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष और मुक्ति मिलती है. इसके बदले पितरों का आशीर्वाद मिलने की भी मान्यता है.

मृत आत्माओं के गयाजी में आने की मान्यता
पुराणों में पितृपक्ष की इस 15 दिनों की अवधि को महालया योग भी कहा जाता है. मान्यता है कि इस दौरान सभी मृत आत्माएं गयाजी में विचरण करती हैं और अपने वंशजों का इंतजार करती हैं. ऐसी आस्था है कि वंशज कब गयाजी पहुंचकर पिंडदान करेंगे और कब उन्हें मुक्ति मिलेगी. इसी विश्वास के चलते देश-विदेश से लाखों की संख्या में पिंडदानी तीर्थयात्री गयाजी पहुंचते हैं. धार्मिक वेदों में वर्णित कथा के अनुसार, भगवान राम भी माता सीता के साथ फल्गु नदी के तट पर पिंडदान करने आए थे. मान्यता है कि जब भगवान राम पिंडदान का सामान लाने के लिए सीता को फल्गु नदी के पास छोड़कर गए, तब नदी से राजा दशरथ का हाथ पिंडदान के लिए बाहर आया.

उस समय माता सीता के पास पिंडदान की सामग्री नहीं थी. उन्होंने बालू से पिंड बनाकर पिंडदान किया, जिससे राजा दशरथ को मोक्ष की प्राप्ति हुई. बाद में भगवान राम सामान लेकर लौटे और अपने पिता का आह्वान किया, लेकिन राजा दशरथ नहीं आए. तब सीता जी ने बताया कि वह पिंडदान कर चुकी हैं. कथा के अनुसार, भगवान राम ने इसका प्रमाण मांगा. जब नदी, गाय और तुलसी से पूछा गया तो सभी ने झूठ बोल दिया. इसके बाद सीता ने उन्हें श्राप दिया. मान्यता है कि यह श्राप आज भी जीवित है. प्राचीन काल को लेकर यह भी मान्यता है कि यहां पिंडदान करने आने वाले व्यक्ति का नाम लेने पर फल्गु नदी से उसका हाथ निकलता था और उसी हाथ पर पिंडदान कर दिया जाता था.

राजस्थान से पहुंचे राजेश पारीक
राजस्थान से अपने पितरों का पिंडदान करने पहुंचे राजेश पारीक ने बताया कि वह अपने सभी मृत पूर्वजों के साथ ज्ञात और अज्ञात पूर्वजों का भी पिंडदान करने आए हैं. उनकी कामना है कि मृत पूर्वजों को मोक्ष और मुक्ति मिले और भगवान विष्णु के चरणों में उन्हें स्थान प्राप्त हो. राजेश पारीक के मुताबिक, धार्मिक ग्रंथों में गयाजी के पिंडदान का विशेष महत्व बताया गया है. मान्यता है कि यहां पिंडदान करने से भगवान विष्णु पितरों को अपने चरणों में स्थान देते हैं और पूर्वजों को पूर्ण मुक्ति प्राप्त होती है.
 

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