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काशी के इस मंदिर में खिचड़ी से प्रकट हुए थे भगवान शिव, दर्शन से मिलता है केदारनाथ जाने जैसा पुण्य, जानें अनोखी मान्यता

काशी के केदार घाट पर स्थित गौरी-केदारेश्वर मंदिर भी ऐसा ही एक प्राचीन और खास मंदिर है. मान्यता है कि यहां भगवान शिव के दर्शन और पूजा करने से भक्तों को केदारनाथ धाम के दर्शन के समान पुण्य फल मिलता है.

Gauri kedareshwer
सुरेश कुमार सिंह
  • वाराणसी,
  • 10 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:37 PM IST

भगवान शिव की नगरी काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है. मान्यता है कि यहां कण-कण में भगवान शिव का वास है और देश के कई प्रमुख तीर्थों के दर्शन का फल काशी में ही मिल जाता है. काशी के केदार घाट पर स्थित गौरी-केदारेश्वर मंदिर भी ऐसा ही एक प्राचीन और खास मंदिर है. मान्यता है कि यहां भगवान शिव के दर्शन और पूजा करने से भक्तों को केदारनाथ धाम के दर्शन के समान पुण्य फल मिलता है. मंदिर में स्थापित शिवलिंग को स्वयंभू माना जाता है और इसकी बनावट भी बेहद अनोखी है.

खिचड़ी से प्रकट हुआ था शिवलिंग
मंदिर के अर्चक के अनुसार, राजा मांधाता भगवान केदारनाथ के भक्त थे और नियमित रूप से भगवान को खिचड़ी का भोग लगाते थे. एक दिन वह खिचड़ी बनाकर केदारनाथ के दर्शन करने नहीं जा सके. उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना करते हुए कहा कि आज वह दर्शन करने में असमर्थ हैं, इसलिए इसी खिचड़ी को भोग के रूप में स्वीकार करें. मान्यता है कि राजा की भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव उसी खिचड़ी में शिवलिंग के रूप में प्रकट हो गए. यह शिवलिंग दो हिस्सों में विभक्त है. एक भाग को गौरी और दूसरे को केदारेश्वर कहा जाता है.

एक दर्शन में सात देवी-देवताओं की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार, गौरी-केदारेश्वर मंदिर में दर्शन करने से भक्तों को सात देवी-देवताओं के दर्शन का फल मिलता है. खिचड़ी के रूप में अन्नपूर्णा माता, माता गौरा और भगवान शिव के दर्शन माने जाते हैं. वहीं मंदिर से मां गंगा, सूर्य देव, भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के दर्शन की मान्यता भी जुड़ी है.

चारों युगों से जुड़ी है मंदिर की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, राजा मांधाता ने यहां भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी. उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए और इसी स्थान पर विशेष स्वरूप में विराजमान होने का वरदान दिया. मान्यता है कि भगवान शिव चारों युगों में अलग-अलग स्वरूप में प्रकट हुए. सतयुग में नवरत्नमय, त्रेतायुग में स्वर्णमय, द्वापर युग में रजतमय और कलियुग में शिलामय स्वरूप की मान्यता है.

दक्षिण भारत और विदेशों से भी आते हैं श्रद्धालु
मंदिर में भगवान शिव को बेलपत्र, फूल, दूध और गंगाजल चढ़ाया जाता है. इसके साथ खिचड़ी का भोग भी लगाया जाता है. धार्मिक विश्वास है कि भगवान शिव स्वयं इस भोग को ग्रहण करने आते हैं. वाराणसी के अलावा दक्षिण भारत और विदेशों से भी श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना करते हैं.

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