इंदौर की अनंत चतुर्दशी की झांकियां सिर्फ गणेश विसर्जन का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये शहर की 150 साल से ज्यादा पुरानी सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं. इस साल 25 सितंबर को निकलने वाले झांकी चल समारोह की तैयारियां अंतिम दौर में हैं. 21 सितंबर को हुई बैठक के मुताबिक शाम 6 बजे डीआरपी लाइन से झांकी कारवां शुरू होगा. इस बार समारोह में डीजे पर प्रतिबंध रहेगा.
झांकी चल समारोह में सबसे आगे खजराना गणेश मंदिर की झांकी रहेगी. इसके बाद शास्त्री कॉर्नर नवयुवक मंडल, आईडीए, नगर निगम, होप टेक्सटाइल, कल्याण मिल, मालवा मिल, हुकुमचंद मिल, स्वदेशी मिल, राजकुमार मिल और स्पूतनिक ट्यूटोरियल एकेडमी की झांकियां शामिल होंगी. रोशनी से सजी ये झांकियां शहर की सड़कों से गुजरेंगी.
मिल मजदूरों ने शुरू की थी परंपरा
इंदौर की झांकी परंपरा का इतिहास 150 साल से भी ज्यादा पुराना बताया जाता है. शहर में सार्वजनिक गणेश उत्सव की शुरुआत 1900 से पहले हुई थी. इसी दौरान मिल मजदूरों ने झांकी बनाने की परंपरा को आगे बढ़ाया. हुकुमचंद मिल से निकली शुरुआती झांकी के बाद यह सिलसिला लगातार बढ़ता गया और अनंत चतुर्दशी का झांकी चल समारोह इंदौर की पहचान बन गया. शुरुआत में झांकियां दिन में निकाली जाती थीं. अंधेरा होने पर गैस बत्तियों से रोशनी की जाती थी. बाद में बिजली के बल्ब और जनरेटर का इस्तेमाल शुरू हुआ. समय के साथ झांकियों में भी कई बदलाव आए.
मिलें बंद हुईं, लेकिन कारीगरों ने नहीं छोड़ी विरासत
आज इंदौर की कई मिलें बंद हो चुकी हैं, लेकिन झांकियां बनाने वाले कारीगर इस परंपरा को अब भी जिंदा रखे हुए हैं. झांकी निर्माता असलम बताते हैं कि उनके पिता ने उन्हें यह कला सिखाई. उनके परिवार के लिए झांकी बनाना सिर्फ कमाई का जरिया नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही जिम्मेदारी है. पहले मिल मजदूरों को झांकी बनाने के लिए लकड़ी और लोहा जैसी सामग्री मिल परिसर से मिल जाती थी. अब मिलें बंद होने के बाद ज्यादातर सामान बाजार से खरीदना पड़ता है. मोटर, मशीन और चलित पुतलों जैसी तकनीक ने झांकियों को आकर्षक बनाया है, लेकिन इससे खर्च भी बढ़ा है.
धार्मिक आयोजन से आगे बनी सांस्कृतिक पहचान
झांकी परंपरा को करीब से देखने वाले महेश गौहर के मुताबिक पहले झांकियों में मिल मजदूरों की मेहनत और हाथों का हुनर साफ नजर आता था. समय के साथ मिलें बंद हुईं और तकनीक बदली, लेकिन लोगों का उत्साह कायम रहा. धीरे-धीरे झांकियों में सामाजिक, राष्ट्रीय और समसामयिक विषय भी शामिल होने लगे.
ये भी पढ़ें: