एक तरफ इंजीनियरिंग की पढ़ाई, अच्छे करियर का सपना और लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी का मौका… दूसरी तरफ बचपन से मन में बसी संतों की वाणी और अध्यात्म की राह. जिंदगी के इस मोड़ पर कोटा के कंदाफल गांव के रहने वाले कथा वाचक पं. रवि जी गौतम ने वह रास्ता चुना, जिसे शायद उनके लिए किसी ने तय नहीं किया था. उन्होंने नौकरी और करियर की दौड़ छोड़कर कथा को अपनी साधना और समाजसेवा का माध्यम बना लिया. आज उनकी कथा सुनने के लिए हजारों श्रद्धालु जुटते हैं, लेकिन इस सफर की शुरुआत महज पांच श्रोताओं से हुई थी.
बचपन में शहर आए, परिवार ने देखा था अफसर बनने का सपना
रवि जी का बचपन गांव में बीता. माता-पिता चाहते थे कि बेटे को बेहतर शिक्षा मिले, इसलिए उन्हें पढ़ाई के लिए शहर लेकर आए. पढ़ाई में शुरू से ही होनहार रवि जी से परिवार को बड़ी उम्मीदें थीं. सपना था कि बेटा खूब पढ़े, अच्छी नौकरी करे और एक दिन बड़ा अधिकारी बने. उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई भी शुरू की. पढ़ाई पूरी होने के बाद लाखों रुपए के पैकेज वाली नौकरी का अवसर भी सामने था. लेकिन इसी बीच उनके भीतर बचपन से पल रहा अध्यात्म का भाव लगातार मजबूत होता गया.
दादाजी के साथ कथा सुनते-सुनते अध्यात्म से जुड़ गया मन
रवि जी के दादाजी उन्हें बचपन से ही संत श्री नागर जी महाराज की कथाएं सुनाने ले जाया करते थे. कथा के दौरान संतों की वाणी और आध्यात्मिक वातावरण ने बाल मन पर गहरा असर छोड़ा. समय के साथ यह लगाव इतना गहरा हुआ कि पढ़ाई और करियर के साथ-साथ उनका मन अध्यात्म की ओर खिंचता चला गया. आखिरकार जब जीवन में करियर चुनने का समय आया तो उन्होंने अपने मन की आवाज को प्राथमिकता दी. पढ़ाई पूरी करने के बाद रवि जी ने कुछ समय तक गणित पढ़ाया. जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ रही थी, तभी कोरोना महामारी आ गई. लॉकडाउन के दौरान सब कुछ थम गया और उन्हें वापस गांव लौटना पड़ा.
यहीं से उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया.
परिवार और आसपास के लोगों के आग्रह पर उन्होंने कथा सुनाना शुरू किया. पहली कथा में श्रोताओं की संख्या महज पांच थी. शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही पांच श्रोता एक ऐसे सफर की शुरुआत करेंगे, जो आगे चलकर हजारों श्रद्धालुओं तक पहुंचेगा.
पांच से हजारों तक पहुंचा कारवां
रवि जी की सबसे बड़ी ताकत बनी उनकी सरल भाषा और सहज कथा शैली. वे कठिन आध्यात्मिक बातों को भी आम लोगों की भाषा में समझाते हैं. यही अंदाज लोगों को पसंद आने लगा. एक गांव में कथा हुई, फिर दूसरे गांव से बुलावा आया. धीरे-धीरे आसपास के इलाकों में उनकी कथाओं की चर्चा होने लगी. देखते ही देखते पांच श्रोताओं से शुरू हुआ सफर हजारों श्रद्धालुओं तक पहुंच गया. आज उनकी कथा में बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं, लेकिन रवि जी के लिए संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण कथा का उद्देश्य है.
कथा के लिए न शुल्क, न मांग… उद्देश्य सिर्फ सेवा
पं. रवि जी गौतम की खास पहचान यह भी है कि वे कथा के लिए कोई शुल्क नहीं लेते और न ही किसी से कुछ मांगते हैं. उनका कहना है कि कथा उनके लिए कमाई का माध्यम नहीं, बल्कि सेवा का रास्ता है. कथा के जरिए वे लोगों को गौसेवा, समाजसेवा और सनातन संस्कृति से जोड़ने का प्रयास करते हैं. वे स्वयं भी नियमित रूप से गौसेवा से जुड़े रहते हैं. इसके साथ ही बालिका शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक जागरूकता जैसे मुद्दों पर भी लोगों को प्रेरित करते हैं.
सादगी ऐसी कि रोजमर्रा के काम भी खुद करना पसंद
हजारों लोगों के बीच पहचान बनने के बावजूद रवि जी का जीवन बेहद सादा है. वे अपने रोजमर्रा के कई काम स्वयं करना पसंद करते हैं. उनके लिए लोकप्रियता से ज्यादा महत्वपूर्ण साधना, सेवा और लोगों के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाना है. अध्यात्म की राह चुनने का फैसला आसान नहीं था. शुरुआत में परिवार की थोड़ी नाराजगी भी रही. माता-पिता चाहते थे कि पढ़ाई में होनहार उनका बेटा अच्छी नौकरी करे और बड़ा अधिकारी बने. लेकिन रवि जी ने अपने मन की आवाज सुनी. उन्होंने तय किया कि उनकी शिक्षा और ज्ञान केवल नौकरी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसे समाज और अध्यात्म की सेवा में लगाया जाएगा. जिस करियर को छोड़ने पर परिवार को चिंता थी, उसी फैसले ने उन्हें हजारों लोगों के बीच पहचान दिला दी. पांच श्रोताओं से शुरू हुई कथा आज हजारों लोगों की आस्था का कारवां बन चुकी है.
ये भी पढ़ें