बुंदेलखंड की मिट्टी में इतिहास सिर्फ किलों, महलों और युद्धों की कहानियों में ही नहीं, बल्कि यहां की धार्मिक परंपराओं और लोक आस्था में भी सांस लेता है. मऊरानीपुर का जलविहार महोत्सव ऐसी ही एक ऐतिहासिक परंपरा है, जहां सैकड़ों वर्षों से चली आ रही परंपरा आज भी हजारों लोगों को अपनी ओर खींचती है. इस परंपरा में सबसे खास नाम है श्री गूदर बादशाह सरकार का, जिनका देव विमान जलविहार में सबसे आगे निकलता है.
पुरानी बैलाई स्थित श्री गूदर बादशाह मंदिर से रात में गाजे-बाजे और धार्मिक उल्लास के बीच भगवान का देव विमान रवाना हुआ. श्रद्धालुओं के बीच इस बात को लेकर खास उत्साह दिखाई दिया कि जलविहार की शोभायात्रा में गूदर बादशाह का विमान सबसे पहले चलता है और उसके पीछे दूसरे देव विमानों की कतार आगे बढ़ती है. स्थानीय लोगों और मंदिर से जुड़े लोगों के मुताबिक गूदर बादशाह की यह परंपरा करीब ढाई से तीन सौ वर्ष से अधिक पुरानी मानी जाती है. हालांकि अलग-अलग वक्ताओं ने इसकी प्राचीनता को अलग-अलग अवधि से जोड़ा है, लेकिन सभी इस बात पर एकमत हैं कि यह परंपरा ब्रिटिश काल से भी पहले से चली आ रही आस्था की मजबूत कड़ी है.
ब्रिटिश दौर में भी नहीं रुकी परंपरा
गूदर बादशाह की इस परंपरा की कहानी सिर्फ धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें उस दौर की यादें भी जुड़ी हैं जब अंग्रेजी शासन में धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाने के प्रयास किए जाते थे. स्थानीय आयोजकों के अनुसार ब्रिटिश शासनकाल में बीमारी और अन्य परिस्थितियों का हवाला देकर जलविहार और देव विमानों के निकलने पर रोक लगाने का प्रयास किया गया था. इसी दौरान यहां के महंतों ने परंपरा को रोकने के बजाय भगवान का विमान निकालने का निर्णय लिया.
मंदिर से जुड़े आयोजक के मुताबिक उस समय महंत लालदास महाराज ने परंपरा को आगे बढ़ाया और गूदर बादशाह का विमान सबसे पहले निकाला. इसके बाद अन्य देव विमानों के निकलने का सिलसिला भी शुरू हो गया. स्थानीय मान्यता है कि तभी से जलविहार में गूदर बादशाह के विमान के सबसे आगे रहने की परंपरा मजबूत होती चली गई. यही वजह है कि आज जब झांसी के मऊरानीपुर नगर में जलविहार का आयोजन होता है तो लोगों की निगाहें सबसे पहले गूदर बादशाह के विमान पर टिकती हैं.
पहले अकेला विमान निकलता था, फिर बढ़ता गया कारवां
स्थानीय निवासी भगवान दास बताते हैं कि पहले गूदर बादशाह का विमान अकेले ही निकलता था. समय के साथ दूसरे मंदिरों के विग्रह और देव विमान भी इस धार्मिक यात्रा का हिस्सा बनते गए. लेकिन परंपरा में गूदर बादशाह की अगुवाई आज भी कायम है. उनके मुताबिक दूसरे देव विमान गूदर बादशाह के आगे नहीं, बल्कि उनके पीछे चलते हैं. इस तरह जलविहार की शोभायात्रा में सबसे आगे रहने की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही.
भगवान दास के अनुसार ब्रिटिश काल में बीमारी समेत अलग-अलग कारणों का हवाला देकर इस परंपरा को रोकने का प्रयास हुआ था, लेकिन साधु-संतों और महंतों ने आगे आकर इसे जारी रखा. आज हजारों श्रद्धालु इस परंपरा के साक्षी बनते हैं और प्रत्येक देव विमान के साथ सुरक्षा व्यवस्था भी रहती है.
80 से ज्यादा देव विमान बनेंगे शोभायात्रा का हिस्सा
मंदिर के आयोजक के अनुसार इस वर्ष जलविहार में करीब 70 से 80 देव विमान शामिल होने की उम्मीद है. इनमें लगभग 40 ऐसे विग्रह बताए गए हैं, जिन्हें स्थानीय लोग प्राचीन और ऐतिहासिक मानते हैं. इसके अलावा गणेश जी और लड्डू गोपाल की झांकियां भी धार्मिक शोभायात्रा की शोभा बढ़ाएंगी. स्थानीय निवासी सुनील कुमार गुप्ता के मुताबिक जलविहार की यह परंपरा करीब ढाई सौ वर्ष पुरानी है. उन्होंने बताया कि भगवान का विग्रह नदी में जाकर जलविहार करता है और इसी धार्मिक परंपरा के तहत हर साल देव विमान निकाले जाते हैं. उनके अनुसार इस बार करीब 50 से 55 बड़े देव विमान और छोटे विग्रहों को मिलाकर कुल 80 से 85 विमानों के शामिल होने की उम्मीद है. हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच निकलने वाला यह धार्मिक कारवां मऊरानीपुर के ऐतिहासिक जलविहार को खास पहचान देता है.
ब्रह्म मुहूर्त में हुआ गूदर बादशाह का जलविहार
रात में नगर भ्रमण और धार्मिक आयोजन के बाद गूदर बादशाह सरकार का जलविहार ब्रह्म मुहूर्त में कराया गया. मान्यता के मुताबिक पहले भगवान गूदर बादशाह नदी घाट पर पहुंचते हैं और जलविहार करते हैं। इसके बाद धार्मिक शोभायात्रा और नगर भ्रमण का क्रम आगे बढ़ता है. सुबह का ब्रह्म मुहूर्त, नदी का घाट, धार्मिक जयकारे और देव विमानों का कारवां, यह पूरा दृश्य मऊरानीपुर के जलविहार को बुंदेलखंड की उन परंपराओं में शामिल करता है, जहां इतिहास और आस्था एक साथ दिखाई देते हैं.
हजारों लोगों की भीड़, प्रशासन ने भी कसी कमर
जलविहार महोत्सव में हजारों श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए प्रशासन ने भी सुरक्षा और व्यवस्थाओं पर विशेष जोर दिया है. स्थानीय लोगों के अनुसार आयोजन के दौरान प्रत्येक देव विमान के साथ पुलिस सुरक्षा की व्यवस्था रहती है.
जिलाधिकारी गौरांग राठी ने बताया कि 158वें जलविहार महोत्सव का शुभारंभ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के साथ किया गया है. उन्होंने कहा कि यह आयोजन अपनी ऐतिहासिक विरासत और अनूठी छटा के लिए दूर-दूर तक जाना जाता है और इसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं. प्रशासन की ओर से सुरक्षा, स्वच्छता, साफ-सफाई, आपातकालीन सेवाओं, बिजली और प्रकाश व्यवस्था समेत जरूरी व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही गई है. एसडीएम और सीओ स्तर के अधिकारी व्यवस्था की निगरानी करेंगे.
अब प्रांतीय मेले का दर्जा दिलाने की तैयारी
जिलाधिकारी गौरांग राठी ने जलविहार महोत्सव को मऊरानीपुर और झांसी की ऐतिहासिक विरासत बताते हुए कहा कि इसे आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा. उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री और पर्यटन मंत्री से विशेष आग्रह कर जलविहार महोत्सव को प्रांतीय मेले का दर्जा दिलाने के लिए प्रयास किया जाएगा. यानी जिस जलविहार की पहचान आज भी देव विमानों की सदियों पुरानी परंपरा, धार्मिक आस्था और स्थानीय इतिहास से बनी हुई है, उसे आने वाले समय में और बड़े स्तर पर पहचान दिलाने की तैयारी है.
परंपरा की 'दौड़' में आज भी सबसे आगे गूदर बादशाह
मऊरानीपुर के जलविहार की सबसे दिलचस्प बात यही है कि यहां देव विमानों की कोई साधारण शोभायात्रा नहीं निकलती. इसके आगे-पीछे चलने का भी अपना इतिहास है. सबसे आगे गूदर बादशाह और पीछे अन्य देव विमान. पीढ़ियां बदल गईं, शासन बदल गए, परिस्थितियां बदल गईं, लेकिन स्थानीय आस्था में गूदर बादशाह की यह 'बादशाहत' आज भी कायम है. कभी जिस परंपरा को रोकने की कोशिशों के बीच महंतों ने आगे बढ़ाया था, वही परंपरा आज हजारों लोगों की मौजूदगी में उत्सव का रूप ले चुकी है.
गाजे-बाजे के बीच निकलता देव विमान, उसके पीछे चलती विमानों की लंबी कतार, सड़कों पर उमड़ती श्रद्धालुओं की भीड़ और ब्रह्म मुहूर्त में नदी घाट पर होने वाला जलविहार, मऊरानीपुर की यह परंपरा बुंदेलखंड के इतिहास को सिर्फ याद नहीं करती, बल्कि उसे हर साल अपनी आंखों के सामने दोबारा जीवंत कर देती है.
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