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Holi 2026: लठमार होली से लेकर होला मोहल्ला और फगुआ, जानें भारत के अलग-अलग हिस्सों में कैसे खेली जाती होली

आखिर भारत के किस कोन में किस प्रकार की होली मनाई जाती है. साथ ही क्या ताल्लुक है इनका परंपराओ से.

Different Type Of Holi In India
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 24 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:24 PM IST

भारत में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता प्रतीक है. देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व अलग-अलग नामों, रस्मों और अंदाज़ में मनाया जाता है. भावना हर जगह एक जैसी होती है खुशी, मेल-मिलाप और उल्लास, लेकिन इसे मनाने के तरीके हर राज्य की अपनी पहचान बताते हैं. कहीं यह लठमार होली है तो कहीं फगुआ, कहीं संगीत प्रधान है तो कहीं शौर्य प्रदर्शन से जुड़ी हुई.

ब्रज की होली
उत्तर प्रदेश का ब्रज क्षेत्र होली के सबसे प्रसिद्ध आयोजनों के लिए जाना जाता है. बरसाना और नंदगांव में मनाई जाने वाली लठमार होली अपनी अनोखी परंपरा के कारण दुनियाभर में मशहूर है. मान्यता है कि यह परंपरा भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कथा से जुड़ी है, जहां महिलाएं प्रतीकात्मक रूप से पुरुषों पर लाठियां बरसाती हैं और पुरुष ढाल से खुद को बचाते हैं.

वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में होली का सौम्य रूप देखने को मिलता है, जहां फूलों की पंखुड़ियों से होली खेली जाती है. वहीं बरसाना के श्रीजी मंदिर में लड्डू होली होती है, जिसमें रंगों से पहले मिठाइयां उड़ाई जाती हैं.

उत्तर भारत की लोक परंपराएं और सामाजिक रंग
हरियाणा में होली को धुलंडी कहा जाता है, जहां खासतौर पर ननद-भाभी के बीच हंसी-मजाक और पारिवारिक चुहल देखने को मिलती है. वहीं पंजाब में होली के अगले दिन सिख समुदाय द्वारा होला मोहल्ला मनाया जाता है. आनंदपुर साहिब में आयोजित यह पर्व केवल रंगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसमें घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्ध कौशल के भव्य प्रदर्शन होते हैं, जिसकी शुरुआत गुरु गोबिंद सिंह जी ने की थी.

उत्तराखंड के कुमाऊं क्षेत्र में बैठकी होली और खड़ी होली का चलन है, जहां लोग रंग खेलने के बजाय शास्त्रीय रागों और लोकगीतों के माध्यम से होली मनाते हैं. हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में यह पर्व 'फाग' के नाम से जाना जाता है.

पूर्वी भारत में संस्कृति और संगीत की होली
पश्चिम बंगाल में होली को डोल जात्रा या बसंत उत्सव कहा जाता है. शांतिनिकेतन में इस उत्सव को सांस्कृतिक पहचान दिलाने का श्रेय रवींद्रनाथ टैगोर को जाता है. यहां पीले वस्त्रों में सजे लोग संगीत, नृत्य और राधा-कृष्ण की प्रतिमाओं की शोभायात्रा के साथ होली मनाते हैं.

उड़ीसा में यह पर्व डोला पूर्णिमा कहलाता है, जबकि बिहार और झारखंड में इसे फगुआ या फगुवा कहा जाता है. इन क्षेत्रों में पारंपरिक होली गीत, ठुमरी और लोक संगीत के साथ रंगों का उत्सव मनाया जाता है.

असम में फाकुवा या दौल और मणिपुर में याओसांग के रूप में यह त्योहार कई दिनों तक चलता है, जिसमें नृत्य, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियां प्रमुख होती हैं.

पश्चिम और दक्षिण भारत की अलग पहचान
महाराष्ट्र में होली के पांच दिन बाद रंग पंचमी मनाई जाती है, जहां गुलाल और अबीर के साथ उत्सव होता है और पारंपरिक पूरनपोली बनाई जाती है. गोवा में होली शिग्मो कहलाती है, जो वसंत ऋतु का भव्य उत्सव है और इसमें बड़े जुलूस व लोक नृत्य होते हैं.

गुजरात में पहले दिन होलिका दहन और अगले दिन धुलेटी मनाई जाती है. वहीं केरल के कोंकणी समुदाय में मंजल कुली या उकुली की परंपरा है, जहां रंगों की जगह हल्दी के पानी का इस्तेमाल किया जाता है.

 

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