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ममता कुलकर्णी ने किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर पद से दिया इस्तीफा, बोलीं- सच को किसी पद या वस्त्र की जरूरत नहीं

ममता कुलकर्णी ने बताया कि उन्होंने 25 साल का संन्यासी जीवन जिया है और आगे भी वे उसी तरह मौन, एकांत और साधना के मार्ग पर रहेंगी. उन्होंने कहा कि वे अपना आध्यात्मिक ज्ञान बिना किसी पार्टी, समूह या विचारधारा से जुड़े, जहां जरूरत होगी वहां साझा करती रहेंगी.

Mamta Kulkarni Kinnar Akhada
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 27 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 6:24 PM IST
  • सच को वस्त्र या पद की जरूरत नहीं
  • महाकुंभ से महामंडलेश्वर बनने तक

ममता कुलकर्णी ने किन्नर अखाड़े के महामंडलेश्वर पद से इस्तीफा दे दिया है. इसका ऐलान उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए किया है. उन्होंने साफ कहा कि वे पूरी तरह स्वस्थ मानसिक स्थिति में यह फैसला ले रही हैं और इसका किसी व्यक्ति से कोई विवाद नहीं है.

सच को वस्त्र या पद की जरूरत नहीं
अपने बयान में ममता कुलकर्णी ने कहा, 'मेरी आध्यात्मिक चेतना जे. कृष्णमूर्ति की तरह स्वतंत्र रूप से बहेगी. सत्य को न तो वस्त्र चाहिए और न ही किसी पद या संस्था की मान्यता.' उन्होंने अपने गुरु श्री चैतन्य गगनगिरि नाथ का हवाला देते हुए कहा कि उनके गुरु ने भी कभी किसी पद या संगठन को स्वीकार नहीं किया.

ममता ने यह भी स्पष्ट किया कि वे डॉ. आचार्य लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी के प्रति पूरा सम्मान और प्रेम रखती हैं और उनके साथ किसी तरह का मतभेद नहीं है.

ममता कुलकर्णी ने बताया कि उन्होंने 25 साल का संन्यासी जीवन जिया है और आगे भी वे उसी तरह मौन, एकांत और साधना के मार्ग पर रहेंगी. उन्होंने कहा कि वे अपना आध्यात्मिक ज्ञान बिना किसी पार्टी, समूह या विचारधारा से जुड़े, जहां जरूरत होगी वहां साझा करती रहेंगी.

विवादों से रहा है गहरा नाता
इस पूरे मामले की जड़ 25 जनवरी (रविवार) का वह बयान भी माना जा रहा है, जब ममता ने अविमुक्तेश्वरानंद विवाद पर कहा था कि 10 में से 9 महामंडलेश्वर और तथाकथित शंकराचार्य झूठे हैं और उनके पास शून्य ज्ञान है. इस बयान के बाद संत समाज में नाराजगी और बढ़ गई थी.

महाकुंभ से महामंडलेश्वर बनने तक
ममता कुलकर्णी 23 जनवरी 2025 को अचानक प्रयागराज महाकुंभ पहुंचीं. वहां उन्होंने किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष रविंद्र पुरी से मुलाकात की. उसी दिन उन्हें महामंडलेश्वर बना दिया गया और नाम रखा गया यामाई ममता नंद गिरि. हालांकि, पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री, बाबा रामदेव समेत कई संतों ने इसका विरोध किया. बाबा रामदेव ने कहा था कि कोई एक दिन में संत नहीं बन सकता.

 

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