भगवान शिव के परम भक्त जामवंत का नाम रामायण और महाभारत दोनों में मिलता है. मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित जामगढ़ और भगदेई गांव आज भी जामवंत से जुड़ी ऐसी मान्यताओं को संजोए हुए हैं, जो श्रद्धालुओं और शोधकर्ताओं दोनों को आकर्षित करती हैं. विंध्याचल पर्वतमाला पर स्थित जामगढ़ का शिवलिंग त्रेता युग में और उसकी तलहटी में स्थित भगदेई का शिवलिंग द्वापर युग में स्वयं जामवंत ने स्थापित किया था. सावन, महाशिवरात्रि और सोमवार के दिन यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं.
200 मीटर ऊंचाई पर त्रेता युग का शिवलिंग
जामगढ़ गांव में विंध्याचल पर्वत की लगभग 200 मीटर ऊंचाई पर स्थित शिव गुफा मंदिर को स्थानीय लोग त्रेता युग का मानते हैं. मान्यता है कि जामवंत ने यहां शिवलिंग स्थापित कर कठोर तपस्या की थी. मंदिर के समीप स्थित कुंड में वर्षभर पानी भरा रहता है और इसी जल से भगवान शिव का अभिषेक किया जाता है. गुफा के भीतर एक स्थान पर लगातार पानी की बूंदें टपकती रहती हैं. श्रद्धालुओं का विश्वास है कि इस जल के सेवन से दमा, हृदय रोग, चर्म रोग सहित कई असाध्य बीमारियों में लाभ मिलता है. ग्रामीणों का दावा है कि प्रातःकाल यहां देवी-देवताओं द्वारा आरती होने के दिव्य दृश्य भी कई लोगों ने देखे हैं.
साधुओं के चमत्कार की भी सुनाई जाती है कथा
कथा के अनुसार मंदिर के पास स्थित गाय गुफा से एक गाय प्रतिदिन निकलकर गांव की गायों के साथ चरने जाती थी. एक चरवाहा उसकी पूंछ पकड़कर गुफा के भीतर पहुंचा, जहां साधु-संत भजन-कीर्तन कर रहे थे. संतों ने उसे भस्म देकर भंडार में रखने को कहा, जिसके बाद उसका अन्न भंडार एक वर्ष तक खाली नहीं हुआ. स्थानीय लोग आज भी इस स्थान पर चमत्कार होने की बातें बताते हैं.
भगदेई का शिव मंदिर, द्वापर युग, अधूरा शिखर और जामवंत के पदचिह्न
जामगढ़ से कुछ दूरी पर स्थित भगदेई गांव का प्राचीन शिव मंदिर भी जामवंत से जुड़ा माना जाता है. जनश्रुति है कि द्वापर युग में जामवंत ने एक ही रात में इसका निर्माण शुरू किया, लेकिन शिखर अधूरा रह गया. कहा जाता है कि निर्माण के दौरान उनकी बहन बिना संकेत दिए वहां पहुंच गईं, जिससे क्रोधित होकर जामवंत ने लंबी छलांग लगाई. मंदिर से लगभग 500 मीटर दूर एक पत्थर पर उनके पैरों के निशान आज भी बताए जाते हैं. आसपास एक शिलालेख भी है, जिसे अब तक पढ़ा नहीं जा सका है.
मंदिर की स्थापत्य शैली को लेकर अलग-अलग मत हैं. कुछ इतिहासकार इसे 9वीं-10वीं शताब्दी के गुर्जर-प्रतिहार काल का मानते हैं, जबकि कुछ विद्वान इससे भी प्राचीन बताते हैं. मंदिर की नक्काशी और शिल्पकला खजुराहो शैली से प्रभावित मानी जाती है. मान्यता है कि यहां प्रतिदिन सूर्योदय की पहली किरण भगवान शिव का अभिषेक करती है और सच्चे मन से की गई पूजा से भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
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