सावन की शुरुआत से पहले संगम नगरी प्रयागराज में भगवान शिव की आराधना को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं. शहर के प्राचीन और प्रसिद्ध मनकामेश्वर मंदिर में इस बार भी बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की उम्मीद है. ऐसे में मंदिर प्रशासन ने श्रद्धालुओं की सुविधा, सुरक्षा और व्यवस्थित दर्शन-पूजन के लिए व्यापक तैयारियां शुरू कर दी हैं.
स्वयंभू शिवलिंग और भगवान राम से जुड़ी है मान्यता
देवाधिदेव महादेव की नगरी प्रयागराज में स्थित प्राचीन मनकामेश्वर मंदिर में भगवान भोलेनाथ का स्वयंभू शिवलिंग विराजमान है. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई प्रार्थना भगवान शिव अवश्य स्वीकार करते हैं और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. यह भी माना जाता है कि भगवान श्रीराम ने भी इस मंदिर में आकर भगवान शिव की पूजा-अर्चना की थी. इसी वजह से यह मंदिर श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था का केंद्र माना जाता है.
सावन में उमड़ती है श्रद्धालुओं की भीड़
हर साल सावन के पवित्र महीने में हजारों श्रद्धालु यहां जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने पहुंचते हैं. पूरे सावन के दौरान मंदिर परिसर शिवभक्ति, भजन-कीर्तन और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गूंज उठता है. सुबह से देर रात तक श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहती हैं और भगवान भोलेनाथ के जलाभिषेक के साथ आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है.
मंदिर प्रशासन ने शुरू की व्यापक तैयारियां
सावन को देखते हुए मंदिर प्रशासन ने मंदिर परिसर की साफ-सफाई, सजावट, दर्शन व्यवस्था, सुरक्षा और श्रद्धालुओं की सुविधाओं को बेहतर बनाने का काम तेज कर दिया है. प्रशासन को उम्मीद है कि पूरे सावन में प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु मंदिर पहुंचेंगे. इसी को ध्यान में रखते हुए व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है.
रुद्राभिषेक के लिए लागू होगा ड्रेस कोड
इस बार मंदिर प्रशासन ने रुद्राभिषेक के लिए विशेष ड्रेस कोड लागू किया है. नियमों के अनुसार, पुरुष श्रद्धालुओं को धोती-कुर्ता और महिला श्रद्धालुओं को साड़ी पहनकर ही रुद्राभिषेक करने की अनुमति होगी. मंदिर प्रशासन का कहना है कि इससे पूजा की परंपरा और पवित्रता बनी रहेगी.
प्लास्टिक के पात्रों पर पूरी तरह रोक
पर्यावरण संरक्षण और मंदिर की पवित्रता को ध्यान में रखते हुए इस बार प्लास्टिक के गिलास, बोतलों या अन्य प्लास्टिक के पात्रों में जल और दूध चढ़ाने पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है. श्रद्धालुओं से अपील की गई है कि वे जलाभिषेक के लिए धातु या मिट्टी के पारंपरिक पात्रों का ही उपयोग करें.
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