आज सावन की शिवरात्रि है. इस मौके पर देशभर के शिव मंदिरों में भक्तों की भीड़ उमड़ रही है. भारत में कई ऐसे मंदिर हैं, जिनसे जुड़ी पौराणिक कथाएं और मान्यताएं उन्हें खास बनाती हैं. आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम में स्थित मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग भी ऐसा ही एक पवित्र धाम है. खास बात यह है कि इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में दूसरा माना जाता है और यह शक्तिपीठ से भी जुड़ा है.
दक्षिण का कैलाश है मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग
नल्लामाला की पहाड़ियों के बीच कृष्णा नदी के किनारे बना मल्लिकार्जुन मंदिर दक्षिण भारत के प्रमुख धार्मिक स्थलों में शामिल है. इसे दक्षिण का कैलाश यानी दक्षिण कैलासम भी कहा जाता है. मान्यता है कि भगवान शिव यहां अपने पुत्र कार्तिकेय को मनाने के लिए यहां पहुंचे थे.
1800 साल से ज्यादा पुराना है मंदिर का इतिहास
मल्लिकार्जुन मंदिर का इतिहास बेहद प्राचीन माना जाता है. यहां मिले शुरुआती शिलालेख सातवाहन काल से जुड़े बताए जाते हैं. इसका इतिहास दूसरी शताब्दी ईस्वी तक जाता है. महाभारत, स्कंद पुराण और अग्नि पुराण जैसे प्राचीन ग्रंथों में भी श्रीशैलम का उल्लेख मिलता है. मान्यता है कि यहां मौजूद शिवलिंग स्वयंभू है. यानी इसे किसी इंसान ने स्थापित नहीं किया, बल्कि यह प्राकृतिक रूप से प्रकट हुआ माना जाता है.
समय के साथ कई राजवंशों ने मंदिर के निर्माण और विस्तार में योगदान दिया. चालुक्यों ने 7वीं-8वीं शताब्दी में पुराने मंदिर का निर्माण कराया. रेड्डी राजवंश ने वीरशिरोमंडपम और पाताल गंगा की सीढ़ियों का निर्माण कराया. विजयनगर साम्राज्य के दौरान मंदिर में कई बड़े बदलाव और निर्माण हुए. बाद में छत्रपति शिवाजी ने भी मंदिर में निर्माण कार्य कराया. माना जाता है कि 1667 में उन्होंने मंदिर का दक्षिणी गोपुरम बनवाया था.
क्यों पड़ा मल्लिकार्जुन नाम?
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथा भगवान शिव, माता पार्वती और उनके दोनों पुत्रों गणेश और कार्तिकेय से जुड़ी है. कहा जाता है कि एक बार शिव-पार्वती के सामने सवाल आया कि दोनों पुत्रों में पहले विवाह किसका हो. इसका समाधान निकालने के लिए दोनों के सामने शर्त रखी गई कि जो सात बार पूरे संसार की परिक्रमा करके पहले लौटेगा, उसका विवाह पहले होगा. कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार होकर संसार की परिक्रमा के लिए निकल गए. वहीं गणेश जानते थे कि वे चूहे की सवारी के साथ तेज गति से संसार का चक्कर नहीं लगा सकते. उन्होंने माता-पिता को ही अपना पूरा संसार मानते हुए शिव और पार्वती की सात बार परिक्रमा कर ली. इस तरह गणेश प्रतियोगिता जीत गए और उनका विवाह रिद्धि, सिद्धि और बुद्धि से हो गया.
जब कार्तिकेय वापस लौटे तो उन्हें यह बात पता चली. वे नाराज होकर कैलाश छोड़कर क्रौंच पर्वत पर चले गए. माता-पिता अपने पुत्र को मनाने वहां पहुंचे और वहीं रहने लगे. मान्यता है कि भगवान शिव ने यहां अर्जुन और माता पार्वती ने मल्लिका रूप धारण किया. इसी वजह से इस स्थान का नाम मल्लिकार्जुन पड़ा.
एक ही जगह ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ
मल्लिकार्जुन को खास बनाने वाली सबसे बड़ी बात इसका शिव और शक्ति दोनों से जुड़ाव है. यहां भगवान शिव मल्लिकार्जुन के रूप में और देवी पार्वती भ्रामराम्बा के रूप में पूजी जाती हैं.
पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब माता सती ने यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए थे, तब भगवान शिव उनका शरीर लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे. इसी दौरान सती के शरीर के अंग अलग-अलग स्थानों पर गिरे और वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए. मान्यता है कि सती का ऊपरी होंठ श्रीशैलम में गिरा था. इसी कारण यहां भ्रामराम्बा देवी का शक्तिपीठ माना जाता है. इसी वजह से श्रीशैलम को शिव और शक्ति की संयुक्त आराधना का स्थान माना जाता है.
'दक्षिण का कैलाश' क्यों कहा जाता है?
श्रीशैलम को ‘दक्षिण कैलासम’ यानी दक्षिण का कैलाश कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं में इसे भगवान शिव के प्रमुख धामों में गिना जाता है. भक्तों का विश्वास है कि मल्लिकार्जुन के दर्शन और पूजा से सुख-समृद्धि मिलती है, मनोकामनाएं पूरी होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग खुलता है. श्रीशैलम की धार्मिक महत्ता का वर्णन कई प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है.
भ्रामराम्बा मंदिर से जुड़ा रहस्य
मल्लिकार्जुन मंदिर परिसर में देवी भ्रामराम्बा का मंदिर भी है. 'भ्रामराम्बा' नाम देवी के भौंरे यानी 'भ्रमर' रूप से जुड़ा है. एक मान्यता के अनुसार, देवी ने राक्षसों का वध करने के लिए भौंरे का रूप धारण किया था. मंदिर में एक छोटे छेद से कई भक्तों को भौंरे जैसी आवाज सुनाई देने की बात भी कही जाती है. इसे देवी की मौजूदगी से जोड़कर देखा जाता है.
द्रविड़ शैली में बना है मंदिर
मल्लिकार्जुन मंदिर अपनी धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ वास्तुकला के लिए भी प्रसिद्ध है. मंदिर परिसर ऊंची दीवारों से घिरा है और इसमें चार बड़े गोपुरम यानी प्रवेश द्वार हैं. मंदिर के अंदर मुख्य गर्भगृह में मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग स्थापित है. यहां बना मुख मंडपम भी अपनी नक्काशी और स्तंभों के लिए आकर्षण का केंद्र है. परिसर में सहस्र लिंग, पांच पांडव लिंग, नंदी की प्रतिमा और नटराज की प्रतिमाओं से सजा दर्पण मंडप भी देखने को मिलता है. मान्यता है कि सहस्र लिंग की स्थापना भगवान राम से जुड़ी हुई है.भ्रामराम्बा देवी का मंदिर मुख्य ज्योतिर्लिंग मंदिर से कुछ ऊंचाई पर स्थित है.
मल्लिकार्जुन और रुद्राक्ष का क्या है कनेक्शन
भगवान शिव की पूजा में रुद्राक्ष का खास महत्व माना जाता है. रुद्राक्ष शब्द रुद्र यानी भगवान शिव और अक्ष यानी आंसू से बना माना जाता है.
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव ने जब मानव कल्याण के लिए गहरी तपस्या की तो उनकी आंखों से निकले आंसू धरती पर गिरे. इन्हीं से रुद्राक्ष के पेड़ उत्पन्न होने की मान्यता है. इसी कारण शिव भक्त रुद्राक्ष की माला धारण करते हैं. अलग-अलग मुखी वाले रुद्राक्षों को अलग-अलग धार्मिक मान्यताओं से जोड़ा जाता है. पंचमुखी रुद्राक्ष को सामान्य रूप से शांति और कल्याण से जोड़ा जाता है, जबकि अन्य मुखी रुद्राक्षों की भी अपनी-अपनी मान्यताएं हैं.
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