Ambubachi Mela 2026: 22 जून से कामाख्या में लगने जा रहा अंबुबाची मेला, मंदिर के कपाट खुलते ही हैरान हो जाते हैं भक्त, जानें इस अनोखी परंपरा का रहस्य

असम के गुवाहाटी में नीलांचल पहाड़ी पर स्थित मां कामाख्या मंदिर में इस साल 22 जून से 26 जून 2026 तक ऐतिहासिक अंबुबाची मेले का आयोजन किया जा रहा है. 22 जून की रात 'प्रवृत्ति अनुष्ठान' के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे, जिसके बाद 3 दिनों के लिए मेले का आयोजन हो जाएगा.

अंबुबाची मेला 2026
अमृता सिन्हा
  • नई दिल्ली,
  • 21 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:43 AM IST

असम की राजधानी गुवाहाटी की नीलांचल पहाड़ी पर स्थित मां कामाख्या मंदिर सिर्फ एक शक्तिपीठ नहीं, बल्कि आस्था, रहस्य और तंत्र साधना का ऐसा केंद्र है, जिसके बारे में जितना पढ़ा जाए, उतना कम लगता है. हर साल यहां एक ऐसा पर्व मनाया जाता है, जिसे देखने और समझने के लिए देश ही नहीं, दुनियाभर से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं. इस पर्व का नाम है अंबुबाची मेला. साल 2026 में अंबुबाची मेले का आयोजन 22 जून से 26 जून तक हो रहा है. जो साल में केवल एक बार लगता है. लेकिन यह कोई सामान्य धार्मिक मेला नहीं है. इसके पीछे एक ऐसी मान्यता जुड़ी है, जो प्रकृति, स्त्री शक्ति और सृष्टि के चक्र को एक साथ जोड़ती है.

जब तीन दिनों के लिए बंद हो जाते हैं मंदिर के कपाट
22 जून की रात विशेष 'प्रवृत्ति अनुष्ठान' के साथ अंबुबाची मेले की शुरुआत होगी. इसके बाद मां कामाख्या मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे. अगले तीन दिनों तक न तो दर्शन होंगे और न ही नियमित पूजा-अर्चना गर्भगृह के अंदर की जाएगी. वहीं 3 दीन बाद 26 जून 2026 को मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए फिर से खोले जाएंगे और इसी के साथ लाखों श्रद्धालुओं की प्रतीक्षा समाप्त हो जाएगी और भक्त माता शक्तिपीठ के दर्शन और पूजा अर्चना फिर से कर पाएंगे. पहली बार इस पूजा के बारे में सुनने वाले लोग अकसर ये सवाल करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता इस पूजा में है? इसका जवाब कामाख्या मंदिर की सबसे अनोखी मान्यता में छिपा है.

मां कामाख्या को क्यों माना जाता है रजस्वला?
मान्यता है कि इन तीन दिनों के दौरान मां कामाख्या रजस्वला होती हैं. जिस तरह एक स्त्री के शरीर में मासिक धर्म की प्रक्रिया होती है, उसी तरह इन दिनों देवी को भी विश्राम दिया जाता है. यही कारण है कि मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और किसी भी प्रकार की पूजा इन दिनों में नहीं की जाती. भारतीय धार्मिक परंपराओं में यह शायद अकेला ऐसा बड़ा पर्व है, जहां स्त्री के जैविक चक्र को छिपाने के बजाय उसे सृष्टि की शक्ति और सृजन का प्रतीक मानकर सम्मान दिया जाता है और 3 दिन पर्व की तरह मनाया जाता है.

कामाख्या मंदिर में देवी की प्रतिमा नहीं है
कामाख्या मंदिर की एक और विशेषता है कि यहां देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है. मंदिर के गर्भगृह में एक प्राकृतिक शिला है, जिसे देवी शक्ति की योनि मानी जाती है. कहा जाता है कि मां सती का ये अंग यहीं गिरा था. इसी योनि से एक प्राकृतिक जलधारा निरंतर बहती रहती है. श्रद्धालु इसी स्थान के दर्शन करते हैं और इसे मां कामाख्या का स्वरूप मानते हैं. 

सती की कथा से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
कामाख्या मंदिर का संबंध प्राचीन पौराणिक कथा से भी जोड़ा जाता है. मान्यता के अनुसार जब राजा दक्ष के यज्ञ में अपमानित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके शरीर को लेकर तांडव करने लगे. भगवान शिव की ये दशा सृष्टि के कल्याण के लिए अच्छी नहीं थी. ब्रह्मांड को बचाने के लिए भगवान विष्णु ने एक निर्णय लिया और अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के कई टुकड़े कर दिए. जहां-जहां सती के अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए. माना जाता है कि कामाख्या में माता सती का योनिभाग गिरा था. इसी कारण यह स्थान शक्ति और सृजन का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र माना जाता है.

अंबुबाची मेले में क्यों जुटते हैं साधु-संत?
जहां एक तरह ये आस्था का केंद्र है वहीं उत्साह के बीच तांत्रिक साधना के लिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इन दिनों देशभर से साधु, संत, अघोरी, तांत्रिक और साधक मां कामाख्या के मंदिर पहुंचते हैं. कहा जाता है कि कई साधक तो पूरे साल इस मेले का इंतजार करते हैं. ताकि वह तंत्र सिद्धि को प्राप्त कर सकें. माना जाता है कि ये जगह हर तरह के ऊर्जा का बड़ा केंद्र भी है. तांत्रिक नीलांचल पहाड़ी के आसपास गुप्त रूप से साधना, जप और विशेष अनुष्ठान करते है. यही वजह है कि अंबुबाची मेले को कई लोग 'तांत्रिक कुंभ' भी कहते हैं.

कपाट खुलने के बाद हैरान रहते है श्रद्धालु
जैसे ही कपाट खुलता है, वहां पड़ा कपड़ा लाल रंग में रंग जाता है, जो लोगों को बहुत हैरान करता है. जब तीन दिन बाद मंदिर के कपाट खुले जाते हैं, तब श्रद्धालुओं को यही कपड़ा विशेष प्रसाद के रूप में दिया जाता है. इसे 'अंगवस्त्र' और 'रक्त वस्त्र' कहा जाता है. मान्यता है कि यह प्रसाद देवी की कृपा पाने के लिए बेहद प्रमुख है. हालांकि जब तक कपाट बंद रहता है, तबतक वहां मेला लगता है, जिसमें हजारों श्रद्धालु रोज आते हैं और विशेष वातावरण के साक्षी बनते हैं. 

ये भी पढ़ें


 

Read more!

RECOMMENDED