कृष्ण जन्माष्टमी एक ऐसा त्योहार है, जो कृष्ण भक्तों के जीवन में विशेष मायने रखता है. दुनियाभर में लोग इस त्योहार को धूमधाम से मनाते हैं, खासकर मथुरा और वृंदावन में पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है. लेकिन बिहार में भी एक ऐसी जगह है, जहां श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव उसी आस्था और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जैसे उनकी जन्मभूमि में. यह जगह है तेघड़ा, बेगुसराय, जहां जन्माष्टमी का ऐतिहासिक मेला आज एक बड़ी परंपरा का हिस्सा बन चुका है.
हजारों लोग पहुंचते हैं तेघड़ा
तेघरा निवासी अंकित कुमार वर्मा बताते हैं कि जन्माष्टमी के मौके पर बिहार के अलग-अलग इलाकों से लोग अपने परिवार और करीबी लोगों के साथ तेघड़ा पहुंचते हैं. ऊंचे-ऊंचे मंडपों में सजी भगवान श्रीकृष्ण की झांकियां श्रद्धालुओं के आकर्षण का बड़ा केंद्र होती हैं. समय के साथ यह आयोजन इतना बड़ा हो गया कि अब करीब आठ किलोमीटर के क्षेत्र में अलग-अलग मंडपों में जन्मोत्सव मनाया जाता है. लेकिन शुरू से ऐसा नहीं था. एक वक्त था जब जन्माष्टमी का ये मेला वहां के परंपरा का हिस्सा नहीं था. एक महामारी ने एक नई परंपरा को जीवंत कर डाला. कैसे? इसपर स्थानीय लोग इसे प्लेग महामारी और चैतन्य महाप्रभु से जोड़कर बताते हैं.
1927 में फैली प्लेग महामारी से जुड़ी है कहानी
दरअसल तेघड़ा के इस जन्माष्टमी मेले की शुरुआत के पीछे वर्ष 1927 में फैली प्लेग महामारी से जुड़ी एक घटना बताई जाती है. उस समय तेघड़ा बाजार और आसपास के ग्रामीण इलाकों में महामारी का काफी प्रकोप था. बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई और डर की वजह से कई परिवार अपने घर छोड़कर दूसरी जगह चले गए थे.
महामारी से बचने के लिए स्थानीय लोगों ने यज्ञ, अनुष्ठान और दूसरे धार्मिक उपाय किए, लेकिन हालात में ज्यादा सुधार नहीं हुआ. इसी दौरान भारत भ्रमण पर निकली चैतन्य महाप्रभु की कीर्तन मंडली तेघड़ा पहुंची. स्थानीय लोगों ने मंडली को महामारी की गंभीर स्थिति के बारे में बताया. इसके बाद मंडली की ओर से भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाने की सलाह दी गई.
1928 में पहली बार लगा जन्मोत्सव का मंडप
इसके बाद वर्ष 1928 में पहली बार तेघड़ा में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का आयोजन किया गया. शुरुआत स्टेशन रोड पर महज एक मंडप से हुई थी. इस आयोजन में स्वर्गीय बंसी पोद्दार, विशेश्वर लाल और लखन साह समेत अन्य लोगों की भूमिका रही. स्थानीय मान्यता के अनुसार, जन्मोत्सव शुरू होने के बाद इलाके में प्लेग का प्रकोप कम होने लगा और लोगों की आस्था इस आयोजन से और मजबूत होती चली गई.
एक मंडप से 15 मंडप तक पहुंचा मेला
पहले एक छोटे से मंडप से शुरू हुआ यह आयोजन धीरे-धीरे अलग-अलग इलाकों तक फैलता गया. वर्ष 1929 में मेन रोड स्थित मुख्य मंडप में जन्मोत्सव मनाया गया. इसके बाद कई वर्षों तक आयोजन का विस्तार होता रहा और नए-नए मंडप जुड़ते गए. आज करीब आठ किलोमीटर के दायरे में 15 मंडपों में भगवान श्रीकृष्ण की झांकियां सजाई जाती हैं.
पेट्रोमैक्स से एलईडी तक पहुंची सजावट
तेघड़ा के इस मेले की सजावट ने भी समय के साथ लंबा सफर तय किया है. जब यहां बिजली की सुविधा नहीं थी, तब बाहर से आने वाले दुकानदार पेट्रोमैक्स और लालटेन लेकर आते थे और इन्हीं की रोशनी में मेला देखते थे, जिससे पूरा माहौल जगमगा उठता था. तब मंडपों में कूट से या उसपर डिजाइन बनाए जाते थे और चमकी चूर्ण चिपकाकर उन्हें सजाया जाता था. आज यही मेला रंग-बिरंगी विद्युत सजावट और एलईडी लाइटों से जगमगाता नजर आता है.
मेले में झांकियों के साथ मनोरंजन भी
तेघड़ा का जन्माष्टमी मेला सिर्फ पूजा और दर्शन तक सीमित नहीं है. यहां अलग-अलग मंडपों में भगवान श्रीकृष्ण की झांकियां सजती हैं, वहीं श्रद्धालुओं के मनोरंजन के लिए अत्याधुनिक झूले, थिएटर और दूसरे आकर्षक चीजें भी लगाए जाते हैं. रात के समय रोशनी से सजी मंडप और झांकियां पूरे इलाके को अलग अलौकिक रंग से रोशन कर देती है.
आज तेघड़ा की पहचान बन चुका है मेला
एक छोटे से मंडप से शुरू हुआ यह जन्मोत्सव आज तेघड़ा की पहचान बन चुका है. करीब आठ किलोमीटर के क्षेत्र में फैला यह आयोजन श्रद्धा, परंपरा और बदलती सजावट का अनोखा मेल दिखाता है. 2026 में यह मेला अपने 100वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है, इसलिए इस बार इसका महत्व और भी खास हो गया है. साथ ही बिहार के मुख्यमंत्री ने इस अनोखी संस्कृति के विस्तार के लिए 11 लाख रुपए की राशि का भी आवंटन किया है.
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