Kashi का Baba Vishwanath से क्या है रिश्ता... कथा, कहानी और इतिहास से जानिए

भगवान शंकर का भारत की धार्मिक राजधानी काशी से हजारों साल पुराना रिश्ता है. कथा है कि जब मां पार्वती ने भगवान शिव को कहीं बसने के लिए स्थान चुनने को कहा तो बाबा विश्वनाथ ने काशी को चुना था.

काशी और बाबा विश्वनाथ का हजारों साल पुराना रिश्ता है
रानू राठौर
  • नई दिल्ली,
  • 20 मई 2022,
  • अपडेटेड 8:05 AM IST
  • काशी का बाबा विश्वनाथ से हजारों साल पुराना रिश्ता है
  • चीनी दार्शनिक फ़ाहियान ने भी किया है जिक्र

मंदिरों का शहर, भारत की धार्मिक राजधानी, भोलेनाथ की नगरी, देशी की सांस्कृतिक राजधानी, इस शहर के जितने नाम उतने ही आयाम हैं. तभी तो इतनी खास है काशी कि हर कोई बस खिंचा चला आता है. एक ओर कल-कल बहती गंगा तो दूसरी ओर अपने विराट स्वरूप में बाबा विश्वनाथ. बाबा विश्वनाथ से काशी का रिश्ता आदिकाल से चला रहा है. पुराणों में कई जगह काशी विश्वनाथ मंदिर का संदर्भ मिलता है. कई धार्मिक ग्रंथ महादेव के काशी में बसने की कहानी कहते हैं. तब से लेकर अब तक बाबा विश्वनाथ काशी की पहचान का हिस्सा रहे हैं. काशी ने अपने आंगन में विश्वनाथ मंदिर के बनने बिगड़ने का पूरा इतिहास अपनी आंखों से देखा है. 

भगवान शिव का काशी से रिश्ता-
एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से हिमालय पर्वत की जगह कहीं और बसने का स्थान चुनने को कहा तो  शिवजी को सारे संसार में राजा दिवोदास की वाराणसी नगरी बहुत पसंद आयी. तब राजा दिवोदास ने ब्रह्मा जी का तप किया और महादेव को वहां बसने नहीं दिया. ब्रह्मा जी के कहने पर शिव जी मंदराचल पर्वत पर चले गए. वे चले तो गए लेकिन काशी नगरी के लिए अपना मोह नहीं त्याग सके. तब भगवान विष्णु ने राजा को तपोवन में जाने का आदेश दिया. उसके बाद वाराणसी महादेव का स्थायी निवास हो गया. कई पौराणिक कथाओं में दावा किया गया है कि काशी शिव और पार्वती का आदि स्थान है और इसीलिए आदिलिंग के रूप में अविमुक्तेश्वर को ही प्रथम लिंग माना गया है. ग्रंथों में काशी विश्वनाथ का प्राचीन नाम अविमुक्तेश्वर बताया जाता है और काशी हज़ारों साल से अविमुक्तेश्वर महादेव का घर हूं. 

फ़ाहियान ने किया है जिक्र- 
405 ईस्वी में चीनी दार्शनिक फ़ाहियान भारत दौरे पर आया. इतिहासकारों के मुताबिक फ़ाहियान के अभिलेखों में अविमुक्तेश्वर का जिक्र मिलता है. लेकिन काशी में विश्वनाथ मंदिर के निर्माण की बात करें तो पहली बार मंदिर का निर्माण वैन्यगुप्त के शासनकाल में 500 से 508 ईस्वी के दौरान करवाए जाने का ज़िक्र मिलता है. इसका उल्लेख 635 ईस्वी में भारत यात्रा पर आए एक दूसरे चीनी नागरिक ह्वेन सांग की किताब में भी मिलता है.

विश्वनाथ मंदिर पर आघात का इतिहास-
पूरे हिंदुस्तान की तरह विदेशी आक्रांतों के लालच, क्रूरता और रक्तपात से काशी का सीना छलनी हो गया. जो विश्वनाथ मंदिर ग्यरहवीं सदी तक काशी की भूमि पर गंगा के किनारे अपने मूल रूप में बना रहा. साल 1034 में पहली बार उस मंदिर ने विध्वंस का सामना किया. इतिहास में पहली बार विश्वनाथ मंदिर के टूटने का उल्लेख 1034 में मिलता है. काशीवासियों ने अपनी आस्था के बूते उस समय मंदिर को अपने हिसाब से दोबारा बनवा लिया. इसके बाद 1194 से 1197 के बीच कुतुबुद्दीन ऐबक की सेना ने इस दौरान मंदिर को तोड़ने की कोशिश की. लेकिन मंदिर को पूरी तरह से तोड़ नहीं पाए. इतिहास में ज़िक्र मिलता है कि साल 1230 में इल्तुत्मिश ने काशी विश्वनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया. कहा जाता है कि इल्तुतमिश के मंदिर बनवाने के बाद 200 साल से ज्यादा समय तक काशी में विश्वनाथ मंदिर सुरक्षित रहा. लेकिन सन 1447 में एक बार फिर मंदिर पर हमला हुआ. इस बार मंदिर तोड़ने की कोशिश की जौनपुर के शासक महमूद शाह शर्की ने. लेकिन 1585 में राजा टोडरमल की सहायता से पंडित नारायण भट्ट ने मंदिर को फिर से बनवा दिया. 

मुगलों के दौर में काशी विश्वनाथ-
मुगलों के दौर में मंदिर को नुकसान पहुंचाने की खूब कोशिश हुई. 17वीं शताब्दी में अकबर के पोते शाहजहां ने ही काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ने का पहला प्रयास किया. इतिहास में दावों के मुताबिक 1632 में शाहजहां ने काशी विश्वनाथ मंदिर तोड़ने की कोशिश की. लेकिन सफल नहीं हो पाया.  तब मंदिर नहीं टूट पाया. लेकिन पिता के काम को बेटे ने अंजाम दिया. बेटे औरंगजेब ने फिर इस कोशिश की दोहराया. साल 1669 में औरंगजेब का फरमान जारी हुआ कि काशी विश्वनाथ मंदिर को तोड़ दिया जाए.    
कहा जाता है कि हमले के दौरान मुगल सेना ने मंदिर के बाहर स्थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को तोड़ने की भी कोशिश की थी लेकिन तमाम प्रयासों के बाद भी वे नंदी की प्रतिमा को तोड़ नहीं पाए. जो आज भी अपने महादेव के इंतज़ार में मंदिर के उसी पुराने परिसर की तरफ एक टक देख रहे हैं. उस दौर में हिंदुओं के कड़े प्रतिरोध के कारण औरंगज़ेब की सेना अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई. 
इतिहास में ज़िक्र मिलता है कि उस समय औरंगजेब के आदेश पर मंदिर के हिस्सों को तुड़वा कर बाबा विश्वनाथ मंदिर के ही ऊपर एक मस्जिद बना दी गई. जिसे बाद में औरंगजेब ने ही अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद नाम दिया. दावा किया जाता है कि आगे चलकर ज्ञानवापी के नाम पर इसी मस्जिद का नाम ज्ञानवापी मस्जिद पड़ गया. ज्ञानवापी यानी ज्ञान का कुंआ.  

मंदिर की मुक्ति का आंदोलन-
कहा जाता है 1752 में मराठा सरदार दत्ता जी सिन्धिया और मल्हार राव होल्कर ने मंदिर की मुक्ति के लिए आंदोलन छेड़ा था. जिसके कुछ सालों बाद इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने शिव मंदिर के निर्माण का बीड़ा उठाया. आखिरकार 1776 से 78 के बीच औरंगज़ेब की बनाई गई मस्जिद के ठीक बगल में मंदिर का निर्माण हुआ. 1836 में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखर को स्वर्ण मंडित कराया.

इतिहासकार जेम्स प्रिंसेप की साल 1831 में प्रकाशित किताब Banaras Illustrated में उस दौर के मंदिर का एक चित्र मिलता है. आने वाले समय में काशी मंदिर पर ईस्ट इंडिया कंपनी का राज हो गया. जिस कारण मंदिर का निर्माण रोक दिया गया. 30 दिसंबर 1810 को बनारस के तत्कालीन जिला दंडाधिकारी वाटसन ने ‘वाइस प्रेसीडेंट इन काउंसिल’ को एक पत्र लिखकर ज्ञानवापी परिसर हिन्दुओं को हमेशा के लिए सौंपने के लिए कहा था, लेकिन यह कभी संभव ही नहीं हो पाया. 

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