ओडिशा के पुरी में स्थित भगवान जगन्नाथ का मंदिर न सिर्फ भारत, बल्कि दुनिया भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का बड़ा केंद्र है. हर साल रथयात्रा जैसे महापर्व में करोड़ों भक्त भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन करते हैं. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान जगन्नाथ की मूर्ति हर 12 साल में बदली जाती है. यह परंपरा जितनी रहस्यमयी है, उतनी ही गहरी धार्मिक मान्यता और वैज्ञानिक सोच से जुड़ी हुई भी मानी जाती है.
क्या है नवकलेवर की परंपरा
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति बदलने की इस परंपरा को ‘नवकलेवर’ कहा जाता है. ‘नव’ का अर्थ है नया और ‘कलेवर’ का मतलब शरीर. यानी भगवान का नया शरीर धारण करना. यह प्रक्रिया सामान्य कैलेंडर के अनुसार हर 12 साल में नहीं होती, बल्कि तब होती है जब आषाढ़ मास में अधिक मास आता है. इसी विशेष संयोग में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र, देवी सुभद्रा और सुदर्शन की मूर्तियों का पुनर्निर्माण किया जाता है.
लकड़ी की क्यों होती है मूर्ति
भगवान जगन्नाथ की मूर्तियां पत्थर या धातु की नहीं, बल्कि खास नीम की लकड़ी से बनाई जाती हैं. मान्यता है कि नीम की लकड़ी औषधीय गुणों से भरपूर होती है और यह जीवन, स्वास्थ्य व शुद्धता का प्रतीक है. समय के साथ लकड़ी स्वाभाविक रूप से नष्ट होती है, इसलिए मूर्ति को बदलना आवश्यक माना गया है. इसे जीवन के चक्र जन्म, मृत्यु और पुनर्जन्म से जोड़ा जाता है.
वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टि
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ कुछ विद्वान इसे वैज्ञानिक सोच से भी जोड़ते हैं. लकड़ी के प्राकृतिक क्षय को देखते हुए मूर्ति बदलना आवश्यक है. वहीं दार्शनिक रूप से यह परंपरा यह संदेश देती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है. जैसे इंसान पुराने शरीर को छोड़ नया शरीर धारण करता है, वैसे ही भगवान भी नवकलेवर धारण करते हैं.
आस्था और परंपरा का अनोखा संगम
भगवान जगन्नाथ की मूर्ति का 12 साल में बदलना सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आस्था, दर्शन और जीवन के सत्य का प्रतीक है. यही कारण है कि नवकलेवर के समय पुरी में श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ जाती है और यह परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और नियमों के साथ निभाई जाती है.
ये भी पढ़ें: