स्कूल, कॉलेज, हॉस्पिटल और ऑफिस में कई ऐसे लोग होते हैं जिनकी हैंडराइटिंग को पढ़ना बहुत मुश्किल होता है. खासकर स्टूडेंट्स और डॉक्टरों की हैंडराइटिंग को लेकर अक्सर मजाक किया जाता है. कुछ लोग कहते हैं कि जिनकी हैंडराइटिंग खराब होती है, वे बहुत तेज दिमाग वाले होते हैं. वहीं कुछ लोग उन्हें लापरवाह मान लेते हैं. लेकिन सच्चाई कुछ और ही होती है. सिर्फ हैंडराइटिंग को देखकर किसी भी इंसान के बारे ओपिनियन बनाना सही नहीं है. लेकिन खराब राइटिंग होने के पीछे के कारण को लेकर मनोविज्ञान काफी कुछ कहता है.
मनोविज्ञान के अनुसार जब कोई बच्चा क्लास में नोट्स लिख रहा होता है या डॉक्टर मरीज का प्रेस्क्रिप्शन लिख रहे होते हैं, तब उनका दिमाग एक ही बात सोच रहा होता है कि कोई जरूरी बात छूटनी नहीं चाहिए. इसलिए वे जल्दी-जल्दी लिखते हैं. इस जल्दबाजी में राइटिंग क्लियर नहीं होती है और हैंडराइटिंग खराब हो जाती है.
हम सभी जानते हैं कि जब कोई काम बहुत तेजी से किया जाता है, तो उसमें छोटी-छोटी गलतियां हो सकती हैं. लिखने में भी यही होता है. अगर हाथ बहुत तेजी से चलता है, तो हर वर्ड साफ-साफ लिखना मुश्किल हो जाता है. इसलिए जल्दी लिखने वाले लोगों की हैंडराइटिंग अक्सर खराब दिखाई देती है.
मनोविज्ञान मानता है कि स्टूडेंट्स को टीचर की हर बात जल्दी-जल्दी लिखनी होती है, ताकि पढ़ाई का कोई जरूरी पॉइंट छूट न जाए. वहीं डॉक्टरों को कम समय में कई मरीजों का प्रेस्क्रिप्शन और रिपोर्ट लिखनी होती है. ऐसे में उनका ध्यान साफ लिखने पर नहीं, बल्कि जल्दी और सही जानकारी लिखने पर होता है. यही वजह है कि उनकी राइटिंग कई बार समझना मुश्किल हो जाता है.
जब कोई इंसान सुन भी रहा हो, समझ भी रहा हो, सोच भी रहा हो और साथ में लिख भी रहा हो, तब दिमाग पर ज्यादा काम करने का प्रेशर बन जाता है. ऐसे समय में दिमाग राइटिंग के बजाय जरूरी बातों पर ज्यादा ध्यान देता है. इसलिए वर्ड पहले जितने साफ नहीं बन पाते.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि खराब राइटिंग का मतलब ये नहीं है कि कोई इंसान कम समझदार, आलसी या लापरवाह है. कई बार इसकी वजह सिर्फ इतना होता है कि वह उस समय जल्दी-जल्दी जरूरी बातें लिख रहा होता है. इसलिए किसी की हैंडराइटिंग देखकर उसके काम करने के तरीके का अंदाजा नहीं लगाना चाहिए.