स्कूल या कॉलेज में कई छात्र कभी-कभी क्लास बंक कर देते हैं. आमतौर पर लोग मान लेते हैं कि ऐसे छात्र पढ़ाई में इंट्रेस्ट नहीं रखते या वे जिम्मेदार नहीं हैं. लेकिन साइकोलॉजी की समझ कुछ अलग बात कहती है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि हर छात्र के क्लास बंक करने की वजह एक जैसी नहीं होती. कई बार यह इस बात पर भी डेपेंड करती है कि वह स्कूल में खुद को कैसा महसूस करता है.
अगर किसी छात्र को स्कूल का माहौल अच्छा नहीं लगता, वह खुद को अकेला महसूस करता है या उसे लगता है कि उसकी बात कोई नहीं सुनता, तो उसका मन पढ़ाई से हट सकता है. कुछ छात्रों को पढ़ाई का तरीका मुश्किल लगता है, जबकि कुछ को अपने साथियों या शिक्षकों से जुड़ी परेशानियां होती हैं. ऐसे में वे क्लास से दूर रहने लगते हैं. यह बात नहीं है कि वे पढ़ाई से नफरत करते हों.
साइकोलॉजी के अनुसार, अगर कोई छात्र बार-बार क्लास छोड़ रहा है तो केवल डांटने या सजा देना इस परेशानी का हल नहीं है. पहले यह समझना जरूरी है कि वह ऐसा क्यों कर रहा है. जब किसी की परेशानी को समझकर मदद की जाती है, तो उसके दोबारा पढ़ाई से जुड़ने की संभावना बढ़ जाती है.
टीचर्स और माता-पिता को छात्रों से खुलकर बात करनी चाहिए. अगर छात्र अपनी परेशानी बिना डर के बता सके, तो उसका भरोसा बढ़ता है. छोटी-छोटी बातें, जैसे उसकी राय सुनना, उसकी मेहनत की तारीफ करना और जरूरत पड़ने पर मदद देना, उसके मन में पढ़ाई के प्रति फिर से इंट्रेस्ट जगा सकती हैं.
हर छात्र का स्वभाव और हालात अलग होते हैं. कोई तनाव में हो सकता है, किसी को पढ़ाई समझने में दिक्कत हो सकती है, तो कोई दोस्ती या परिवार से जुड़ी परेशानी से गुजर रहा हो सकता है. इसलिए केवल क्लास बंक करने के आधार पर किसी छात्र को आलसी या गैर-जिम्मेदार कहना सही नहीं है. पहले उसकी स्थिति को समझना और फिर सही मदद देना ज्यादा जरूरी है.