जब लोग रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते हैं, तो बिल आने के बाद काफी देर तक बिल को पहले देखते हैं, उसके बाद बिल पे करते हैं. जबकि कुछ लोग बिल्कुल इसके उलट होते हैं, वह बिना देखे बिल में लिखी रकम को चुका देते हैं. बिल को गौर से देखने वाले खाने की कीमत, टैक्स, सर्विस चार्ज, डिस्काउंट और फाइनल रकम को ध्यान से देखते हैं. देखने में यह बात बहुत कॉमन लगती है, लेकिन इसके पीछे एक साइकोलॉजी काम करती है.
बिल को दो बार चेक करने से इंसान को बिल की सही जानकारी मिलती है. कई बार खाने की कीमत के अलावा टैक्स या दूसरे चार्ज भी बिल में जुड़ जाते हैं. ऐसे में दोबारा बिल देखने से इंसान को पता चल जाता है कि उसे आखिर कितनी रकम देनी है. इससे उसकी अंदर पैदा हुआ शक खत्म हो जाता है कि कहीं बिल गलत या ज्यादा तो नहीं जोड़ दिया.
साइकोलॉजी कहती है कि कुछ लोग ऐसी हालात पसंद नहीं करते, जहां उन्हें किसी चीज़ के बारे में क्लेरिटी न हों. इसलिए वे चीजों को दोबारा चेक कर खुद को ज्यादा संतुष्ट महसूस करते हैं.
रेस्टोरेंट के बिल में कभी-कभी गलती भी हो सकती है. किसी सामान की कीमत गलती के दो बार जुड़ सकती है या ऐसा आइटम बिल में आ सकता है, जिसे कस्टूमर ने मंगाया ही नहीं. इसलिए बिल को ध्यान से देखना एक तरह से सावधानी भी है.
दोबारा जांच करने से व्यक्ति यह सेफ महसूस करता है कि बिल में सभी चीजें सही हैं. इससे पेमेंट करने के बाद उसे पछतावा या परेशानी की संभावना कम हो सकती है.
बिल चेक करने की एक वजह अपना बजट भी हो सकता है. Mental Accounting के मुताबिक लोग अपने पैसों को अलग-अलग खर्चों के हिसाब से मन में बांटकर रखते हैं.
जैसे, किसी व्यक्ति ने रेस्टोरेंट में ₹1,000 खर्च करने का मन बनाया हो और बिल ₹1,300 आए. ऐसे में वह दोबारा बिल देखकर समझना चाहता है कि ₹300 कहां खर्च हुए. इससे उसे अपने खर्च का बेहतर अंदाजा मिलता है.
रेस्टोरेंट का बिल दो बार चेक करने वाले व्यक्ति को तुरंत चिंता या बहुत ज्यादा परेशान मानना सही नहीं है. कई लोगों के लिए यह केवल सावधानी और पैसों का सही हिसाब रखने की आदत हो सकती है.