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बॉस ने बुलाया, आपने सोचा गई नौकरी... अगर आपके साथ ही होता है ऐसा, तो एक्स्ट्रा एंग्जायटी के शिकार हैं आप, जानें कैसे निकले इससे बाहर

अक्सर कई लोगों के साथ होता है कि वह किसी चीज के बारे में पहले से नेगेटिव धारणा बना लेते हैं. उनके साथ गलत होगा इसका कोई सबूत नहीं होता, लेकिन फिर भी वह नेगेटिव थॉट का अंबार लगा लेते है.

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Negetive Thinking (AI) Negetive Thinking (AI)

अक्सर हम कई बार ऐसी बातों के बारे में सोचते हैं, जो वास्तव में हुई ही नहीं होती है. खासतौर पर ये बाते होती भी नेगेटिव ही हैं. जैसे अगर किसी दोस्त ने मैसेज का जवाब नहीं दिया तो लगता है कि शायद वो वह नाराज है. या फिर ऑफिस में अगर छोटी सी भी गलती हो जाए तो मन में नौकरी जाने का डर सताने लगता है. सिर में हल्का दर्द हुआ तो दिमाग माइग्रेन-सर्वाइकल की तरफ दौड़ने लगता है. 

इनमें से कुछ भी सच नहीं हुआ होता, फिर भी डर बिल्कुल असली लगता है. जिसकी वजह से हम टेंशन में आ जाते है. ऐसे में सोचना वाजिब है कि आखिर हमारा दिमाग इस तरह से क्यों काम करता है.

दिमाग क्यों सोचता है हर स्थिति में बुरी?

हमारा दिमाग इस तरह से बना है कि वह खतरे को पहचाने और हमारी सेफ्टी के लिए तैयार रहे. जब कोई खतरा सामने आता है तो दिमाग तुरंत एलर्ट मोड पर आ जाता है. लेकिन ज्यादा एलर्ट मोड पर आने से चिंता ज्यादा होने लगती है और हमारा सेफ्टी सिस्टम जरूरत से ज्यादा एक्टिव रहता है. 

ऐसे में हमारा दिमाग हर स्थिति में खतरा खोजने लगता है. जहां पूरी जानकारी नहीं भी होती, वहां वह खुद ही सबसे खराब नतीजे की कहानी खुद बुनने लग जाता है. इसी वजह से कोई भी पॉसिबिलिटी हमें ऐसी लगने लगती है जैसे वह जरूर होने वाली है.

डर और सच में फर्क करना क्यों मुश्किल होता है?

टेंशन या एंग्जायटी की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि यह डर को बिल्कुल सच जैसा महसूस करा सकती है. जैसे बॉस ने मीटिंग के लिए बुलाया तो मन फौनम सोचने लगता है कि जरूर काम में कोई गलती हुई है. लेकिन इसके पीछे कोई पक्का सबूत नहीं होता है.

हमारे लिए याद रखना जरूरी है कि दिमाग में आया हर ख्याल सच नहीं होता. सिर्फ किसी बुरी घटना के बारे में ऐसा सोचना कि वह सच होगी, ऐसा हमारी मेंटल पीस के लिए भी खराब है. केवल सबूत की कमी से चलते ही हमें हमारा डर सच लगने लगता है, इसलिए बेहतर है कि जब तक चीज घटित न हो जाए, हम उसके बारे में खराब न सोचें.

डर का असर शरीर पर पड़त है गहरा

एंग्जायची का असर सिर्फ सोच पर नहीं पड़ता. डर बढ़ने से दिल तेज धड़कने लग सकता है, पसीना आ सकता है, शरीर में तनाव महसूस हो सकता है या सांस तेज चल सकती है. फिर व्यक्ति इन लक्षणों को देखकर और ज्यादा डरने लगता है. इस तरह दिमाग और शरीर एक-दूसरे के डर को बढ़ाते रहते हैं.

किस तरह बचें इस तरह की सोच से?

जब आपको लगे कि दिमाग लगातार सबसे बुरा सोच रहा है, तो सबसे पहले उस विचार को पहचानें. खुद से पूछें कि इस डर का कोई पक्का सबूत है या यह सिर्फ एक पॉसिबिलिटी है. अपने ध्यान को मौजूदा समय में लाने की कोशिश करें. धीरे-धीरे सांस लें और आसपास की चीजों पर ध्यान दें. डर को खत्म करना जरूरी नहीं है. लेकिन जरूरी यह समझना है कि डर एक थॉट है, फ्यूचर की गारंटी नहीं.