Pink Ball vs Red Ball Difference: आज के समय में क्रिकेट दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेलों में से एक है. सबसे पहले वनडे नहीं बल्कि टेस्ट क्रिकेट खेला गया था. पहला टेस्ट मैच 1877 में इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया के बीच खेला गया था. टेस्ट क्रिकेट लंबे समय लाल गेंद (Red Ball) से खेला जा रहा है. हालांकि इन दिनों गुलाबी गेंद (Pink Ball) से भी टेस्ट मैच खेला जाने लगा है. हालांकि पिंक बॉल को लेकर कुछ नियम बनाए गए हैं. दुनिया के कुछ महान क्रिकेटर टेस्ट मैच पिंक बॉल से खेलने की हिमायती हैं.
आपको मालूम हो कि टेस्ट क्रिकेट में कई बार खराब रोशनी के कारण गेंद नहीं दिखती, जिसके चलते समय से पहले मैच को रोकना पड़ता है. इससे ओवरों का नुकसान होता है. अभी ऑस्ट्रेलिया और साउथ अफ्रीका के बीच डरबन में खेले टेस्ट मैच में भी खराब रोशनी के कारण खेल काफी प्रभावित हुआ. खराब रोशनी के चलते शुरुआती तीन दिनों में लगभग 50 ओवरों का नुकसान हुआ. ऐसे में शॉन पोलॉक ने दिन के टेस्ट में लाल की जगह गुलाबी गेंद के इस्तेमाल का सुझाव दिया है. आइए जानते हैं लाल और गुलाबी गेंद में क्या अंतर है, किससे टेस्ट क्रिकेट को अधिक फायदा होगा और बॉल यूज करने को लेकर ICC का नियम क्या है?
लाल की जगह पिंक गेंद का सुझाव क्यों
आपको मालूम हो कि मौजूदा समय में टेस्ट मैच 5 दिन तक खेला जाता है. एक दिन में सामान्य तौर पर 90 ओवर फेंकने का लक्ष्य रहता है. इस तरह से कुल 5 दिनों में 450 ओवर का खेल निर्धारित होता है. कई बार खराब रोशनी के कारण बार-बार मैच रोकना पड़ता है. ऐसे में टीमों को अपनी रणनीति के मुताबिक खेलने का पर्याप्त समय नहीं मिलता. आपको मालूम हो कि टेस्ट क्रिकेट में दिन के मैचों के दौरान आज भी लाल गेंद का इस्तेमाल होता है. लाल गेंद को तेज रोशनी में आसानी से देखा जा सकता है, लेकिन आसमान में घने बादल छाने या शाम के समय रोशनी कम होने पर खिलाड़ियों को मैदान में लाल गेंद को देखने में परेशानी होती है.
ऐसे में शॉन पोलक ने सुझाव दिया है कि यदि ऐसी परिस्थिति बनती हैं तो लाल की जगह पिंक यानी गुलाबी गेंद का इस्तेमाल किया जा सकता है. पोलॉक का सुझाव है कि टेस्ट क्रिकेट में खराब रोशनी के कारण होने वाले नुकसान को कम करने के लिए गुलाबी गेंद की मदद से कुछ अतिरिक्त ओवर कराए जा सकते हैं. पिंक रंग काफी चमकीला होता है. ऐसे में कम रोशनी और बादलों से घिरे आसमान में भी पिंक गेंद को देखने में कोई परेशानी नहीं होगी. लाल गेंद की तुलना में पिंक गेंद का रंग अधिक स्पष्ट नजर आ सकता है.
रेड बॉल और पिंक बॉल में क्या है मुख्य अंतर
1. आपको मालूम हो कि रेड बॉल दिन की रोशनी काफी अच्छी दिखाई देती है. ऐसे में ग्रीन मैदान पर और वाइट ड्रेस में रेड बॉल बल्लेबाजों को दिन में खेलने के लिए आसान होती है. रेड बॉल रात के अंधेरे में खेलने के लिए ठीक नहीं मानी जाती है. उधर, पिंक बॉल रात में खिलाड़ियों को काफी अच्छी दिखाई देती है. पिंक बॉल को डे-नाइट मैच के लिए ही मुख्य रूप से बनाया गया है. पिंक बॉल कम रोशनी में भी अच्छे से खेलने में मदद करती है.
2. आपको मालूम हो कि रेड बॉल को सफेद रंग के धागे से सिला जाता है. उधर, पिंक बॉल को काले रंग के धागे से सिला जाता है. रेड और पिंक बॉल के स्विंग और सीम में भी अंतर होता है. पिंक बॉल रेड गेंद की तुलना में अधिक स्विंग करती है. पिंक बॉल अच्छी रोशनी के दौरान अधिक स्विंग और सीम मूवमेंट प्राप्त करती है.
3. गुलाबी गेंद की चमक अधिक समय तक चलती है. पिंक बॉल जल्दी घिसती नहीं है. उधर, लाल रंग की गेंद पिंक बॉल की तुलना में जल्दी पुरानी हो जाती है. गुलाबी रंग की गेंद 45 से 50 ओवर तक सख्त रहती है, जबकि लाल रंग की गेंद 35 से 40 ओवर के बाद नरम हो जाती है. पिंक बॉल रेड बॉल की तुलना में कम स्पिन होती है. ऐसे में स्पिनर्स को रेड बॉल की तुलाना में गुलाबी गेंद से कम मदद मिलती है. तेज गेंदबाजों को पिंक बॉल से काफी मदद मिलती है.
गुलाबी गेंद को लेकर क्या है नियम
आपको मालूम हो कि पहले टेस्ट मैच सिर्फ दिन में ही खेला जाता था लेकिन जब टेस्ट मैच को डे-नाइट खेलन पर विचार किया गया तो पाया गया कि रेड बॉल रात के समय फ्लडलाइट खिलाड़ियों को विजिबिलिटी की दिक्कत दे रही है. इससे बचने के लिए डे-नाइट टेस्ट मैच पिंक बॉल से खेला जाने लगा. पिंक बॉल को कम रोशनी और फ्लडलाइट में बेहतर दृश्यता को ध्यान में रखकर विकसित किया गया था. आपको मालूम हो कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (ICC) ने खराब दृश्यता की समस्या से निपटने के लिए सामान्य दिन के टेस्ट मैचों में भी पिंक बॉल के इस्तेमाल की व्यवस्था की है. हालांकि, इसके लिए दोनों टीमों के कप्तानों की सहमति जरूरी है. दोनों कप्तानों को टॉस से पहले इस बदलाव पर सहमत होना होगा. यदि दोनों कप्तान राजी हों तो गुलाबी गेंद को दिन के टेस्ट में इस्तेमाल किया जा सकता है.