Sophisticated Fraud: साइबर ठगी का नया तरीका, IIT का नाम लेकर पढ़े-लिखों को भी शिकार बना रहे ठग, कहीं आपके पास भी तो नहीं आया मेल

ठग प्रोफेसरों या यूनिवर्सिटी प्रशासन से संपर्क करते हैं और कहते हैं कि उनके नाम पर करोड़ों रुपये का रिसर्च प्रोजेक्ट पास हुआ है. इसके बाद वे एक शर्त रखते हैं, प्रोजेक्ट को सिक्योर करने और फंडिंग शुरू करवाने के लिए पहले 2-3% रकम एक एस्क्रो अकाउंट में जमा करनी होगी.

सॉफिस्टिकेटेड फ्रॉड
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 21 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 2:21 PM IST
  • सॉफिस्टिकेटेड फ्रॉड से रहें सावधान
  • रिसर्च फंडिंग का झांसा देकर यूनिवर्सिटी को बनाया निशाना

जब भी साइबर ठगी की बात होती है, तो अक्सर माना जाता है कि इसका शिकार कम पढ़े-लिखे या जागरूकता की कमी वाले लोग ही होते हैं. लेकिन अब साइबर ठग इतने शातिर हो चुके हैं कि वे बड़े-बड़े प्रोफेसरों, यूनिवर्सिटी हेड्स और नामी संस्थानों तक को निशाना बना रहे हैं और उन्हें करोड़ों का चूना लगा रहे हैं. पुणे की एक यूनिवर्सिटी के साथ ऐसा ही फ्रॉड हुआ था, जहां ठगो ठगों ने आईआईटी बॉम्बे के प्रोफेसर और सरकारी अनुसंधान (DRDO/DST) अधिकारी बनकर यूनिवर्सिटी के CAO को बेवकूफ बनाया और करीब 2.5 करोड़ रुपये की ठगी की.

सॉफिस्टिकेटेड फ्रॉड के केस आ रहे सामने
यह धोखाधड़ी इतनी चालाकी से की जा रही है कि बड़े-बड़े प्रोफेसर, यूनिवर्सिटी हेड और संस्थान भी इसके जाल में फंस सकते हैं. ठग खुद को आईआईटी जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से जुड़ा बताते हैं और विश्वविद्यालयों को करोड़ों रुपये के रिसर्च प्रोजेक्ट्स का लालच देते हैं. ये प्रोजेक्ट्स कथित तौर पर सरकारी संस्था ANRF (अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन) से जुड़े बताए जाते हैं, जिससे ऑफर विश्वसनीय लगने लगता है.

ठग प्रोफेसरों या यूनिवर्सिटी प्रशासन से संपर्क करते हैं और कहते हैं कि उनके नाम पर करोड़ों रुपये का रिसर्च प्रोजेक्ट पास हुआ है. इसके बाद वे एक शर्त रखते हैं, प्रोजेक्ट को सिक्योर करने और फंडिंग शुरू करवाने के लिए पहले 2-3% रकम एक एस्क्रो अकाउंट में जमा करनी होगी. यह रकम अक्सर लाखों या करोड़ों में होती है. खास बात यह है कि ठग जल्दी निर्णय लेने का दबाव भी बनाते हैं, जैसे- 'वीकेंड तक पेमेंट करनी होगी वरना मौका चला जाएगा.'

सॉफिस्टिकेटेड फ्रॉड क्या होता है?
सॉफिस्टिकेटेड फ्रॉड का मतलब होता है ऐसी धोखाधड़ी जो बहुत सोच-समझकर, प्रोफेशनल तरीके से और भरोसेमंद दिखने वाली जानकारी के साथ की जाए.

इस तरह के फ्रॉड में ठग-

  • असली संस्थानों के नाम का इस्तेमाल करते हैं

  • असली प्रोफेसरों या अधिकारियों के नाम लेते हैं

  • ईमेल, कॉल और डॉक्यूमेंट्स को असली जैसा बनाते हैं

  • प्रोजेक्ट का पूरा खाका भी भेजते हैं

  • बातचीत में तकनीकी भाषा का इस्तेमाल करते हैं

यानी सब कुछ इतना असली लगता है कि शक करना मुश्किल हो जाता है.

कैसे काम करता है यह फ्रॉड?
टारगेट चुनना: खासतौर पर प्राइवेट यूनिवर्सिटी या ऐसे संस्थान जिन्हें अपनी रैंकिंग सुधारनी होती है.
विश्वास बनाना:आईआईटी या सरकारी संस्था से जुड़ाव का दावा करना.
बड़ा ऑफर देना: 20-100 करोड़ रुपये तक के प्रोजेक्ट्स की बात करना.
एडवांस पेमेंट की मांग: प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले 2-3% रकम मांगना.

क्यों फंस रहे हैं लोग?

  • प्रतिष्ठित संस्थानों का नाम भरोसा पैदा करता है

  • रिसर्च फंडिंग का मौका आकर्षक लगता है

  • जल्दी निर्णय लेने का दबाव सोचने का समय नहीं देता

  • डॉक्यूमेंट्स और बातचीत बेहद प्रोफेशनल होती है

कैसे बचें इस तरह के फ्रॉड से?

1. एडवांस पेमेंट से सावधान रहें: कोई भी सरकारी या प्रतिष्ठित संस्थान पहले पैसे नहीं मांगता.

2. आधिकारिक ईमेल चेक करें: हमेशा @official domain से आए ईमेल पर ही भरोसा करें.

3. जल्दी निर्णय लेने के दबाव में न आएं: ठग अक्सर ‘urgent’ कहकर दबाव बनाते हैं.

4. क्रॉस वेरिफिकेशन करें: संस्थान की वेबसाइट या आधिकारिक संपर्क से जानकारी की पुष्टि करें.

5. संदिग्ध कॉल/मैसेज की रिपोर्ट करें: ऐसे मामलों को पुलिस या साइबर सेल में जरूर रिपोर्ट करें.

 

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