दिल्ली-एनसीआर की भागदौड़ भरी जिंदगी में कभी-कभी ऐसा लगता है कि बस कहीं पहाड़ों में चले जाएं और सुकून से जिंदगी गुजारें. ट्रैफिक का शोर पीछे छूट जाए, मोबाइल नेटवर्क न हो और सामने सिर्फ हरियाली, पहाड़ और सुकून हो. लेकिन हर बार कुल्लू-मनाली या ऋषिकेश का प्लान बनाना और वहां जा कर घूम आना उतना आसान भी नहीं है, जितना हम ख्यालों में सोच लेते हैं. पैसे तो खर्च होते ही हैं और वक्त की कमी के कारण मन भी नहीं भरता. ऐसे में अगर मैं कहूं कि दिल्ली और नोएडा से करीब 35-65 किलोमीटर की दूरी पर ही आपको कुल्लू-मनाली जैसे पहाड़ों का आनंद मिल सकता है, तो शायद आपका यकीन करना थोड़ा मुश्किल होगा. गुरुग्राम मेटरो स्टेशन से लगभग 12-15 किलोमीटर दूर एक ऐसी हसीन दुनिया है जो हर तरह के थकान को मिटी देती है.
यकीन मानिए ये सच है कि अब दिल्ली-नोएडा से कुछ दूर पर ही आपको पहाड़ मिलेंगे. पिछले वीकेंड मैं गुरुग्राम के अरावली इलाके की तरफ निकल गई. सच कहूं तो शुरुआत में लगा था कि यह भी किसी आम ड्राइविंग रूट जैसा होगा, लेकिन कुछ ही किलोमीटर बाद पूरा नजारा बदल गया. एक तरफ गुरुग्राम की ऊंची-ऊंची इमारतें, कंस्ट्रक्शन का शोर और भागती जिंदगी थी, तो दूसरी तरफ सदियों पुराने अरावली के पहाड़. बताया जाता है कि अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है. राजस्थान से निकलकर यह पर्वतमाला हरियाणा तक फैली हुई है और हरियाणा में इसका विस्तार करीब 150 किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र में माना जाता है.
नई दुनिया से हुई मुलाकात
जैसे-जैसे गाड़ी आगे बढ़ती गई, सड़क सांप की तरह बल खाती हुई पहाड़ों के बीच से गुजरती रही. यहां कोई चौड़ी फोर लेन सड़क नहीं है, बल्कि दो लेन का रास्ता है, जो हर मोड़ पर नया नजारा दिखाता है. यही कारण है कि लोग यहां गाड़ी बड़े सलीके से चलाते हैं. रास्ते में कई जगह माउंटेन व्यू पॉइंट हैं, जहां लोग गाड़ियां रोककर फोटो खिंचवाते नजर आते हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि यहां सिर्फ पहाड़ ही नहीं हैं. यह इलाका लेपर्ड जोन के तौर पर भी जाना जाता है. हालांकि मुझे कोई तेंदुआ नहीं दिखा, लेकिन स्थानीय लोग बताते हैं कि यहां उनकी मौजूदगी रहती है. रास्ते में मोरों की आवाज लगातार सुनाई देती है. जैसे-जैसे सड़क मुड़ती है और ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों से सामना होता, ऐसा लगता है जैसे पूरा जंगल कदम-कदम पर आपका स्वागत कर रहा हो.
ट्रेकिंग और मंचिंग के लिए है बेस्ट
यह जगह ट्रेकिंग पसंद करने वालों के लिए भी शानदार है. सुबह और शाम के समय बड़ी संख्या में लोग यहां पैदल ट्रेक करते दिखाई देते हैं. कई लोग साइक्लिंग करते हैं तो कई सिर्फ पहाड़ों के बीच बैठकर समय बिताने आते हैं. रास्ते में छोटे-छोटे मंदिर भी मिल जाते हैं, जहां लोग कुछ देर रुककर माथा टेकते हैं. खाने-पीने की चिंता भी यहां नहीं करनी पड़ती. कदम-कदम पर चाय, मैगी, पकौड़े और लोकल स्नैक्स बेचने वालों के ठेले और रेहड़ियां नजर आ जाती हैं.
सुकून की तलाश में आते हैं लोग
शाम होते-होते माहौल पूरी तरह बदल जाता है. कई लोग अपनी कार में म्यूजिक चलाकर दोस्तों के साथ बैठ जाते हैं. ऑफिस खत्म होने के बाद यहां दोस्तों की छोटी-छोटी महफिलें सजती दिखाई देती हैं. कोई कॉफी पी रहा होता है, कोई पहाड़ों को निहार रहा होता है और कोई बस शहर की थकान उतारने आया होता है. वीकेंड पर यहां की तस्वीर बिल्कुल अलग होती है. भीड़ इतनी बढ़ जाती है कि कई जगह पार्किंग के लिए इंतजार करना पड़ता है. हालांकि अगर आप थोड़ा अंदर जाएंगे तो आपको भिड़ थोड़ी कम मिलेगी. लेकिन इसके बावजूद लोग यहां आना पसंद करते हैं, क्योंकि शहर के इतने करीब ऐसा सुकून शायद ही कहीं और मिले.
मिलेंगे एक्के-दुक्के घर
एक चीज जिसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभावित किया, वह थे पहाड़ों की तलहटी में बसे पुराने घर. आधुनिक गुरुग्राम से कुछ ही दूरी पर आज भी ऐसे परिवार रहते हैं, जिनके आंगन में भैंसें बंधी नजर आती हैं. पुराने मकान, मिट्टी की खुशबू और धीमी रफ्तार वाली जिंदगी इस पूरे सफर को और खास बना देती है.
अगर आप भी दिल्ली, नोएडा या गुरुग्राम में रहते हैं और पहाड़ों की याद सता रही है, तो जरूरी नहीं कि हर बार लंबी छुट्टी लेकर हिमाचल ही जाया जाए. कभी एक शाम अरावली की इन पहाड़ियों के नाम भी करके देखिए. हो सकता है लौटते वक्त आपको लगे कि पहाड़ सिर्फ सैकड़ों किलोमीटर दूर नहीं, बल्कि आपके शहर के बिल्कुल पास भी रहते हैं. मौका मिले तो आप भी जाइए और कुछ वक्त आराम से बिताइए.
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