श्रीलंका में पिछले कई महीनों से अर्थव्यवस्था खराब होने से राजनीति में भी घमासान मचा हुआ है. इस बीच, शुक्रवार को वरिष्ठ नेता दिनेश गुणवर्धने ने श्रीलंका के नए प्रधानमंत्री पद और गोपनीयता की शपथ ली. श्रीलंका के नए राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने शुक्रवार को अपने मंत्रिमंडल को शपथ दिलाई.
आपको बता दें कि 72 वर्षीय गुणवर्धने अप्रैल में ही पूर्व राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के कार्यकाल के दौरान गृह मंत्री नियुक्त हुए थे. इसके अलावा गुणवर्धने विदेश मंत्री और शिक्षा मंत्री के तौर पर भी अपनी सेवाएं दे चुके हैं. श्रीलंकाई राजनीति के दिग्गज गुणवर्धने को उनके स्पष्ट बोलने के लिए जाना जाता है.
कौन हैं दिनेश गुणवर्धने
श्रीलंका के पूर्व गृह मंत्री दिनेश गुणवर्धने राजपक्षे के सहयोगी हैं और उन्होंने तीन बार श्रीलंका की संसद में सदन के नेता के रूप में कार्य किया. गुणवर्धने का जन्म 2 मार्च 1949 को फिलिप गुणवर्धने और कुसुमा गुणवर्धने के घर हुआ था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, उनके पिता 'बोरालुगोडा के शेर' के रूप में जाने जाते थे, और स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीक रहे.
गुणवर्धने ने नीदरलैंड में न्येनरोड बिजनेस यूनिवर्सिटी से इंटरनेशनल बिजनेस में डिप्लोमा और ओरेगन विश्वविद्यालय से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट में बीबीए किया हुआ है. उन्होंने साल 1973 में महाजन एकसाथ पेरामुना के साथ श्रीलंका की राजनीति में प्रवेश किया और 1983 में वे मगरगामा से सांसद चुने गए.
तीन बार बने हैं सदन के नेता
गुणवर्धने, पहले अक्टूबर 2018 से दिसंबर 2018 तक, दूसरी बार, जनवरी 2020 से अगस्त 2020 तक और तीसरी बार अगस्त 2020 में सदन के नेता बने. इसके अलेवे उन्होंने कई मंत्री पदों को संभाला है, जिनमें शामिल हैं-
भारत से है खास नाता
रिपोर्ट्स के मुताबिक दिनेश गुणवर्धने एक ट्रेड यूनियन नेता हैं और अपने महान पिता फिलिप गुणवर्धने की तरह एक सेनानी हैं. फिलिप को श्रीलंका में समाजवाद के जनक के रूप में जाना जाता है. इसके अलावा, दिनेश गुणवर्धने का भारत से एक अलग रिश्ता भी अपने पिता के कारण है.
दरअसल, फिलिप गुणवर्धने ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की लड़ाई में हिस्सा लिया था. फिलिप का भारत के प्रति प्रेम और साम्राज्यवादी शासन के खिलाफ स्वतंत्रता की दिशा में प्रयास 1920 के दशक की शुरुआत में संयुक्त राज्य अमेरिका में शुरू हुए. न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक वह विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय में जयप्रकाश नारायण और वीके कृष्ण मेनन के सहपाठी थे. जहां उन्होंने अमेरिकी राजनीतिक हलकों में साम्राज्यवाद से भारत की स्वतंत्रता की वकालत की, और बाद में लंदन में भारत की साम्राज्यवाद विरोधी लीग का नेतृत्व किया.
लड़ी थी भारत की आज़ादी की लड़ाई
फिलिप ने सिर्फ दूसरे देशों में ही नहीं बल्कि भारत में आकर भी सेनानियों का साथ दिया. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान श्रीलंका (तब एक ब्रिटिश उपनिवेश, सीलोन) से भागने के बाद गुणवर्धने के पिता फिलिप और मां कुसुमा भारत आ गए. और अपनी पहचान छिपाकर देश के स्वतंत्रता सेनानियों के साथ शामिल हो गए.
लेकिन साल 1943 में, उन दोनों को ब्रिटिश खुफिया विभाग ने पकड़ लिया. फिर उन्हें बॉम्बे की आर्थर रोड जेल में रखा गया और एक साल बाद, उन्हें श्रीलंका भेज दिया गया. वहां से उन्हें युद्ध की समाप्ति के बाद ही रिहाई मिली. इस तरह, भारत के साथ उनका जुड़ाव लगभग सौ साल पहले दक्षिण एशिया को ब्रिटिश राज से मुक्त करने के लिए शुरू हुआ था.
पूर्व-प्रधानमंत्री नेहरू गए थे घर
भारत की आजादी के बाद, देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू व्यक्तिगत रूप से फिलिप और कुसुमा का धन्यवाद देने के लिए श्रीलंका में उनके पुश्तैना घर गए थे. साल 1948 में श्रीलंका को यूनाइटेड किंगडम से स्वतंत्रता मिलने के बाद, फिलिप और कुसुमा दोनों संसद के सदस्य बने. फिलिप 1956 में पीपुल्स रिवोल्यूशन सरकार के संस्थापक नेता और कैबिनेट मंत्री थे. उनके सभी चार बच्चों ने कोलंबो के मेयर, कैबिनेट मंत्रियों, सांसदों आदि सहित उच्च राजनीतिक पदों पर भी कार्य किया है.
अपने माता-पिता की तरह साफ-सुथरी छवि रखने वाले दिनेश गुणवर्धने, भारत के साथ बेहतर संबंधों के लिए तर्क देते हुए, 22 सालों से ज्यादा समय तक एक शक्तिशाली कैबिनेट मंत्री रहे हैं. अब उनके प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सबकी नजरें गुणवर्धने पर हैं कि कैसे वह श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और सामान्य जनजीवन को संभालते हैं और देश में शांति लाते हैं.