इजराइल में गत मंगलवार को चुनाव होने के बाद वोटों की गिनती जारी है. इस बार किसी भी दल को पूर्ण बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है. इजराइल की केंद्रीय चुनाव समिति की ओर से रात 11:35 बजे (स्थानीय समय) जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार 90 प्रतिशत वोटों की गिनती हो गई है. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का गठबंधन सबसे आगे चल रहा है, लेकिन उसे बहुमत नहीं मिला है. उधर, पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजनकोट का विपक्षी गठबंधन भी सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़े से पीछे है. ऐसे में अरब पार्टियां किंगमेकर की भूमिका निभा सकती हैं. आइए जानते बेंजामिन नेतन्याहू के फिर से प्रधानमंत्री बनने और सरकार बनाने के लेकर क्या समीकरण बन रहा है?
सरकार बनाने के लिए चाहिए इतनी सीटों पर जीत
आपको मालूम हो कि इजराइल की संसद को नेसेट कहा जाता है. इसमें कुल 120 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए 61 सीटों पर जीत जरूरी है. अभी तक की काउंटिंग में नेतन्याहू के लिकुड के नेतृत्व वाले गुट को करीब 53 सीटें मिलने की संभावना है. उधर, आइजनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को करीब 48 सीटें मिलती दिख रही हैं. अरब दलों को तकरीबन 19 सीटें मिलतीं नजर आ रहीं है. कोई भी गठबंधन सरकार बनाने के लिए जरूरी बहुमत का आंकड़ा नहीं छू पा रहा है. ऐसे में सरकार बनाने के लिए अरब पार्टियों के हाथ में सत्ता की चाबी है. आपको मालूम हो कि नाम भले ही अरब दल है लेकिन यह दल अरब के किसी देश का नहीं है. इजराइल में अरब पार्टियां वे राजनीतिक दल हैं, जो इजराइल में रहने वाले अरब नागरिकों (मुख्य रूप से फिलिस्तीनी मूल के नागरिकों) के हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं. अरब दल में दो मुख्य पार्टियां हैं. एक यूसुफ जबरीन के नेतृत्व वाली जॉइंट लिस्ट और दूसरी मुख्य अरब पार्टी मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली राम है.
नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब दलों पर लगाएं हैं ये आरोप
बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड ने अरब दलों पर चुनाव में गड़बड़ी करने और वोट चुराने का आरोप लगाए हैं. लिकुड पार्टी का दावा है कि अरब दलों ने ज्यादा वोट हासिल करने के लिए गलत तरीके अपनाए. उसने दावा किया है कि वोटरों को मतदान के लिए प्रेरित करने में भ्रष्टाचार, धमकी, हिंसा, झूठ और प्रतिबंधित सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया गया. लिकुड पार्टी ने अरब दलों पर आतंकवाद का समर्थन करने और यहूदी देश को खत्म करने की कोशिश करने का आरोप भी लगाया है. अब सवाल है कि इस बार किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है तो बेंजामिन नेतन्याहू फिर कैसे अपनी सरकार बना पाएंगे. आपको मालूम हो कि इस बार सरकार बनाने में अरब दलों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है. अरब दलों के साथ बेंजामिन नेतन्याहू की पार्टी लिकुड का संबंध अच्छा नहीं है. नेतन्याहू ने अरब दलों के समर्थन से सरकार बनाने का विरोध किया है तो फिर वह कैसे अपनी सरकार बनाएंगे.
जॉइंट लिस्ट और राम पार्टी का क्या है कहना
अरब दलों शामिल मुख्य पार्टी जॉइंट लिस्ट के नेता यूसुफ जबरीन ने कहा कि उनकी पार्टी अपनी जीती हुई सीटों का इस्तेमाल नेतन्याहू की सरकार को हटाने और इजराइल की राजनीतिक स्थिति को बदलने में मदद करने के लिए करेगी. जबरीन ने कहा कि जॉइंट लिस्ट गादी आइजनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल नहीं हो सकती लेकिन बाहर से आइजनकोट के गुट को समर्थन देने की संभावना खुली है. उधर, राम का नेतृत्व कर रहे मंसूर अब्बास ने कहा है कि उनकी पार्टी आइजनकोट के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होगी. आपको मालूम हो कि इस बार चुनाव में अरब पार्टियों की जॉइंट लिस्ट 12 और राम 7 सीटों पर आगे हैं. ऐसे में दोनों को मिलाकर 19 सीटें हो रही हैं. यह इजराइल के चुनावी इतिहास में अरब पार्टियों का अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा हैं. इससे पहले 2020 के चुनाव में इन पार्टियों ने 15 सीटें जीती थीं.
इजराइल में सरकार बनाने को लेकर क्या बन रहा समीकरण
1. नेतन्याहू अपने प्रतिद्वंद्वी आइजनकोट से मिला लें हाथ
इस बार चुनाव में किसी भी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिल रहा है. ऐसे में यदि बेंजामिन नेतन्याहू फिर से अपनी सरकार बनाने के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी आइजनकोट से हाथ मिला लें तो सत्ता उनके पास ही रह सकती है. इसके लिए नेतन्याहू को एक राष्ट्रीय एकता सरकार में शामिल होने के लिए आइजनकोट को मनाना होगा. आपको मालूम हो कि बड़ी पार्टियां तभी एक साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता सरकार बनाती हैं जब देश में कोई बड़ा संकट हो. ऐसा करने के लिए आइजनकोट को अपने मुख्य एजेंडे को छोड़ना पड़ेगा. आइजनकोट का पूरा चुनाव अभियान ही नेतन्याहू को सत्ता से हटाने पर केंद्रित रहा है. ऐसे में नेतन्याहू के नेतृत्व में फिर से सरकार बनाने को लेकर यह समीकरण बनता नहीं दिख रहा है.
2. बेंजामिन नेतन्याहू विपक्षी गठबंधन को फोड़ दें
बेंजामिन नेतन्याहू के नेतृत्व में फिर से सरकार बनाने को लेकर दूसरा समीकरण यह बन रहा है कि नेतन्याहू यदि आइजनकोट के गुट की दक्षिणपंथी पार्टियों को तोड़कर अपनी सरकार में ला दें. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसके लिए दो नाम बेयाचद गठबंधन के नेता नफ्ताली बेनेट और इजराइल बेइतेनु पार्टी के नेता अविग्दोर लिबरमैन सबसे आगे हैं. ये दोनों नेता देश की सुरक्षा के मुद्दे पर कट्टर दक्षिणपंथी हैं और कई मामलों में नेतन्याहू से मिलते-जुलते हैं.
3. आइजनकोट सरकार बनाने के लिए अरब दलों के साथ मिला लें हाथ
इजराइल में सरकार बनाने को लेकर तीसरा समीकरण यह बना रहा है कि आइजनकोट सरकार बनाने के लिए अरब दलों के साथ हाथ मिला लें. हालांकि ऐसा होता नहीं दिख रहा है क्योंकि आइजनकोट और उनके गुट की अधिकतर यहूदी पार्टियों ने पहले ही अरब दलों संग मिलकर सरकार बनाने से इनकार कर दिया है.
4. फिर से हो सकता है चुनाव
आपको मालूम हो कि इजराइल में सरकार बनाने में राष्ट्रपति इसाक हर्जोग की भूमिका भी अहम होगी. वह राजनीतिक दलों से बातचीत करेंगे और उस नेता को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं, जिसके पास बहुमत जुटाने की बेहतर संभावना होगी. इसके लिए पहले उम्मीदवार को 28 दिन मिल सकते हैं. जरूरत पड़ने पर 14 दिन की अतिरिक्त मोहलत भी दी जा सकती है. अगर पहला उम्मीदवार नाकाम रहता है, तो दूसरे नेता को मौका मिल सकता है. यदि कोई भी नेता बहुमत जुटाने में सफल नहीं होता, तो इजराइल में दोबारा चुनाव कराने पड़ सकते हैं. दोबारा चुनाव को कई लोग नेतन्याहू की एक तरह की जीत मानेंगे, क्योंकि नए चुनाव होने तक वे कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने रहेंगे और उन्हें यह भी लगता हो कि दोबारा चुनाव में उनके जीतने के बेहतर मौके हैं.