आज यानी 15 अप्रैल को इतिहास का एक बड़ा हादसा हुआ था. उस हादसे में 1500 से ज्यादा लोगों की जान चली गई थी. साल 1912 में टाइटैनिक जहाज समंदर में आइसबर्ग से टकरा गया था. हादसे के बाद जहाज अटलांटिक महासागर में डूब गया था. दावा किया गया था कि टाइटैनिक कभी नहीं डूब सकता. लेकिन अपनी पहले सफर पर ही इस जहाज का अंत हो गया.
बुर्ज खलीफा की ऊंचाई से 4 गुना गहराई में टाइटैनिक-
टाइटैनिक जहाज का मलबा समंदर की सतह से 12500 फीट की गहराई में है. इसका मतलब है कि टाइटैनिक का मलबा दुनिया की सबसे ऊंची इमारत बुर्ज खलीफा की ऊंचाई से साढ़े 4 गुना ज्यादा गहराई में है. इस गहराई का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सूरज की रोशनी समंदर में 660 फीट तक ही जा सकती है.
टाइटैनिक जहाज का मलबा सितंबर 1985 में मिला था. ये समंदर से नीचे अटलांटिक सागर में है. टाइटैनिक के मलबे को खोजने का काम अमेरिका और फ्रांस ने किया था. मलबा कनाडा के सेंट जॉन्स के साउथ में 700 किमी दूर और अमेरिका के हैलिफोक्स से 595 किलोमीटर दक्षिणपूर्ण में है. जहाज के 2 टुकड़े एक-दूसरे से 800 मीटर दूरी पर मिले थे.
कैसे डूबा था टाइटैनिक?
टाइटैनिक जहाज जब हादसे का शिकार हुआ था, उस समय वो इंग्लैंड के साउथम्पैटन से अमेरिका के न्यूयॉर्क की तरफ जा रहा था. रास्ते में जहाज एक हिमखंड से टकरा गया. जहाज के डूबने में 4 घंटे का वक्त लगा. जह हादसा हुआ तो जहाज की रफ्तार 41 किलोमीटर प्रति घंटे थी.
कैसा था टाइटैनिक जहाज?
टाइटैनिक एक विशालकाय जहाज था. इसका असली नाम आरएमएस टाइटैनिक था. इसकी लंबाई 269 मीटर , चौड़ाई 28 मीटर और ऊंचाई 53 मीटर थी. टाइटैनिक में 3 इंजन थे. इस जहाज की क्षमता 3300 मुसाफिरों की थी. जब ये जहाज पहली बार सफर पर निकला था तो उसमें 1300 मुसाफिर और 900 चालक दल के सदस्य सवार थे.
3 साल में बनकर तैयार हुआ था टाइटैनिक-
इसको बनाने में 3 साल का वक्त लगा था. टाइटैनिक जहाज का निर्माण स्टील से किया गया था. इसको बनाने में उस वक्त 15 लाख पाउंड खर्च किए गए थे. इस जहाज का टिकट काफी महंगा था. उस समय फर्स्ट क्लास में सफर करने के लिए 30 पाउड और सेकंड क्लास में सफर के लिए 13 पाउंड देने पड़े थे. जबकि थर्ड क्लास में 7 पाउंड खर्च करके मुसाफिरों ने सफर किया था.
ये जहाज अपनी पहली यात्रा पर ब्रिटेन से अमेरिका के लिए निकला था. लेकिन बीच समंदर में एक आइसबर्ग से टकरा गया. जिसकी वजह से ये समंदर में डूब गया. इसका मलबा आज भी समंदर की गहराइयों में पड़ा है.
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