Advertisement

अमेरिका ने 25 मिलियन डॉलर में खरीद लिए थे डेनमार्क के 3 द्वीप, जानें डील का पूरा किस्सा

अमेरिका ग्रीनलैंड को हथियाने के लिए लगातार आक्रामक रूख अख्तियार किए हुए है. हालांकि यूरोप के तमाम देश डेनमार्क के समर्थन में खड़े हुए हैं. इससे पहले साल 1917 में अमेरिका ने डेनमार्क से उसका एक हिस्सा ले लिया था. अमेरिका ने 25 मिलियन डॉलर में तीन द्वीपों को खरीद लिया था. इसके लिए डेनमार्क और अमेरिका के एक लंबा प्रोसेस चला.

U.S. Capitol
gnttv.com
  • नई दिल्ली,
  • 20 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:09 PM IST

डेनमार्क का हिस्सा ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका और यूरोप में तनाव बढ़ता जा रहा है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार आक्रामक बयानबाजी कर रहे हैं. उधर, यूरोप के देश भी अमेरिका के विरोध में उतर गए हैं. कई देशों ने ट्रंप की इस महत्वाकांक्षी को लेकर विरोध जताया है. इस बीच अमेरिका ने ग्रीनलैंड में सैन्य विमान तैनात करने ऐलान किया है.

डेनमार्क का हिस्सा छीनने के लिए कोशिश कर रहे ट्रंप का अमेरिका पहले भी ऐसा कर चुका है. अमेरिका ने डेनमार्क का एक हिस्सा ले लिया था. अमेरिका ने साल 1917 में डेनमार्क से उसका एक हिस्सा ले लिया था. चलिए उसकी पूरी कहानी बताते हैं.

USA ने डेनमार्क से हासिल किया था ये इलाका-
अमेरिका ने पहले भी डेनमार्क से उसका हिस्सा छीन लिया था. साल 1917 में यूएसए ने कैरेबियन सागर के तीन द्वीप डेनमार्क से ले लिया था. इन द्वीपों को यूएस वर्जिन आईलैंड्स के नाम से जाना जाता है. अमेरिका ने डेनमार्क से इन तीनों द्वीपों का सौदा किया था. इन द्वीपों के नाम सेंट थॉमस, सेंट जॉन और सेंट क्रिक्स थे.

इन द्वीपों से डेनमार्क से खूब कमाया मुनाफा-
इन तीनों द्वीपों पर डेनमार्क ने 17वीं और 18वीं सदी के बीच में कब्जा किया था. उस समय डेनमार्क में एक कॉलोनियल पावर हुआ करता था. उस समय इन तीनों द्वीपों को डेनिश वेस्ट इंडीज नाम दिया गया था. इन जगहों पर गन्ने की खूब खेती होती थी. इसलिए डेनमार्क को इन द्वीपों से खूब फायदा होता था. इन द्वीपों पर गुलाम अफ्रीकी लोगों से मजदूरी कराई जाती थी. इससे डेनमार्क को खूब फायदा होता था. उस समय चीनी की कीमतें काफी ज्यादा थी. इसलिए डेनमार्क के लिए ये द्वीप फायदे का सौदा थे. 

साल 1840 के दशक में चीनी के दाम गिरने लगे. जिसकी वजह से समस्याएं आने लगी. डेनमार्क को इन द्वीपों को रखना महंगा पड़ने लगा. इनके देखभाल पर काफी खर्च होने लगा. उसी समय कैरेबियन सागर में अमरिका अपने पैर जमाने लगा था. अमेरिका को लगा कि इन द्वीपों पर कब्जा करने से उसको फायदा हो सकता है. इसके साथ ही अमेरिका को ये भी डर था कि अगर कोई दुश्मन इन द्वीपों पर कब्जा कर लेगा तो उसके लिए खतरा बन सकता है. इसके बाद साल 1865 में अमेरिका ने डेनमार्क से एक समझौता किया.

पहले अमेरिका, फिर डेनमार्क का समझौते से इनकार-
अमेरिकी विदेश मंत्री विलियम हेनरी सीवर्ड ने डेनमार्क को समझौते के लिए मना लिया था. लेकिन अमेरिकी संसद ने इस समझौते को खारिज कर दिया. इसके बाद कुछ समय के लिए ये ठंडे बस्ते में चला गया. 

लेकिन जल्द ही इसपर फिर से काम शुरू हुआ. 19वीं सदी के आखिरी दशक में एक बार फिर से डेनमार्क से इसको लेकर बातचीत शुरू की. साल 1902 में अमेरिकी संसद से इसे मंजूरी भी मिल गई. लेकिन इस बार डेनमार्क की संसद ने इसे रद्द कर दिया.
 
अमेरिका खरीद लिए तीनों द्वीप-
लेकिन अमेरिका को फिर एक मौका मिला. जब पहला वर्ल्ड वार शुरू हुआ था. इस युद्ध में डेनमार्क न्यूट्रल था. लेकिन अमेरिका डर था कि जर्मनी डेनमार्क और उसके द्वीपों पर कब्जा कर सकता है और उसका इस्तेमाल कर सकता है. अमेरिका ने फिर से कोशिश की, लेकिन डेनमार्क इसके लिए तैयार नहीं था. जैसे ग्रीनलैंड के लेकर अभी अमेरिका डेनमार्क को सेना भेजने की धमकी दे रहा है, वैसे ही उस समय भी अमेरिका ने डेनमार्क को सेना भेजने की धमकी दी थी. इस धमकी के सामने डेनमार्क झुक गया. इसके बाद साल 1917 में डेनमार्क ने डेनिश वेस्ट इंडीज को बेच दिया. इसके बदले अमेरिका ने डेनमार्क को 25 मिलियन डॉलर दिए.

भले ही तीनों द्वीप अमेरिका का हिस्सा हैं. लेकिन इन द्वीपों पर रहने वाले लोग अमेरिका के चुनाव में वोट नहीं डाल सकते है. हालांकि इन लोगों को अमेरिका का नागरिकता मिली हुई है.

ये भी पढ़ें:

 

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Advertisement