क्रेमिलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर की मुलाकात 24 अगस्त को हुई. इस दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने एक व्यक्तिगत संदेश रूसी राष्ट्रपति तक पहुंचाया. दोनों की मुलाकात के दौरान पीछे की तरफ एक आदमकद मूर्ति दिखाई दे रही है. लेकिन ये मूर्ति ना तो कम्युनिज्म के जनक कार्ल मार्क्स है और ना ही रूस के महान क्रांतिकारी और राजनीतिज्ञ लेनिन की है. फिर भी ये मूर्ति ग्रैंड क्रेमलिन पैलेस के ग्रीन ड्रॉइंग रूम में लगी हुई है. चलिए आपको कभी रूस में राजतंत्र के समर्थक रहे इस ताकतवर इंसान के बारे में बताते हैं.
सम्राट निकोलस प्रथम की है आदमकद मूर्ति-
ग्रैंड क्रेमलिन पैलेस के ग्रीन ड्रॉइंग रूम में लगी आदमकद मूर्ति रूस के सम्राट निकोलस प्रथम की है. ये मूर्ति कांस्य की बनी है. निकोलस रूस के एक ताकतवर सम्राट थे. उन्होंने 30 सालों तक रूस शासन किया. निकोलस को नाइट ऑफ ऑटोक्रेसी और जेंडरमे ऑफ यूरोप कहा जाता था. निकोलस ने 'एक जार, एक चर्च और एक रूस' का नारा दिया था.
शुरू में राजगद्दी के दावेदार नहीं थे निकोलस-
शुरुआत में निकोलस प्रथम कभी राजगद्दी के लिए दावेदार नहीं थे. वो अपने भाइयों में काफी छोटे थे. इसलिए उनको राजगद्दी मिलने की उम्मीद नहीं थी. उनकी रुचि सेना में ज्यादा थी. निकोलस के बड़े भाई अलेक्जेंडर का कोई बेटा नहीं था, जबकि दूसरे भाई ने राजगद्दी पर बैठने से इनकार कर दिया था. इसलिए साल 1823 में निकोलस को उत्तराधिकारी बनाया गया.
राजतंत्र के प्रबल समर्थक-
सम्राट निकोलस ने अपने शासन में किसी भी क्रांतिकारी विचार को बढ़ने नहीं दिया. वो राजतंत्र के प्रबल समर्थक थे. वो आलोचना को बर्दाश्त नहीं रते थे. निकोलस ने एक गुप्त पुलिस बल नाया था. जिसे थर्ड सेक्शन के नाम से जाना जाता था. निकोलस ने 1849 में हंगरी में क्रांति को दबाने के लिए ऑस्ट्रियाई सम्राट फ्रांस जोसेफ की मदद के लिए सेना भेजी थी. जार निकोलस प्रथम 1825 से 1855 तक रूस के सम्राट, पोलैंड के राजा और फिनलैंड के ग्रैंड ड्यूक थे.
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