Terakota
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यूपी की योगी सरकार प्रदेश में विकास के लिए तरह-तरह की योजनाएं चला रही है. इन योजनाओं से लोगों को रोजगार मिल रहा है, उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी हो रही है. यूपी सरकार कि एक जिला एक उत्पाद योजना ने स्थानीय कारीगरों और छोटे उद्यमियों के जीवन को पूरी तरह बदल दिया है. इस योजना के चलते गोरखपुर के तेराकोटा को न सिर्फ देश में बल्कि विदेशों में भी पहचान मिली है. आपको मालूम हो कि गोरखपुर तेराकोटा के लिए प्रसिद्ध है. यहां के कुम्हार कारीगरों द्वारा अपने कौशल का परिचय देते हुए मिट्टी के सुंदर खिलौने जिसे तेराकोटा कहा जाता है के माध्यम से पूरी दुनिया में फेमस है. ऑनलाइन मंचों के माध्यम से हर साल करोड़ों रुपए से अधिक उत्पाद बिक रहे हैं.
उत्तर प्रदेश सरकार की एक जिला एक उत्पाद योजना में शामिल होने के बाद तेराकोटा का भौगोलिक संकेतक (GI Tag) मिला. यही कारण है इसे देश-विदेश में एक नई पहचान मिली है. इस कला से खुटहन खास, लंगडी गुलरिया, पादरी बाजार जैसे तमाम गांव जहां सैकड़ों गरीब परिवार व महिलाओं को सीधे तौर पर रोजगार मिला, जिन्होंने करोड़ों रुपए का कारोबार केवल तेराकोटा से किया है. तालाब की खास चिकनी मिट्टी से बनने वाले हाथी, घोड़े, दीए, सजावटी सामान की मांग अब महानगरों और विदेशों में तेजी से बढ़ रही है.
जीरो से डेढ़ करोड़ रुपए तक पहुंची आमदनी
राजन प्रजापति जो राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित हो चुके हैं, आज उनके करोड़ों रुपए का बिजनेस है. गुलरिया क्षेत्र में राजन की फैक्ट्री है, जहां से इनके एक साथ दो ट्रक माल लादकर बाहर जाता है. एक ट्रक कम से कम 4 से 5 लाख का माल लादकर जाता है. इसके बावजूद भी घर में और उनकी नीचे ऊपर फैक्ट्री में उतना ही माल लगभग बच्चा रहता है. राजन प्रजापति पहले मिट्टी के घर में रहा करते थे और आज वह एक बड़ी हवेली में रहते हैं. जहां नीचे-ऊपर लगभग 25 मजदूर काम कर रहे हैं. यहां से टेराकोटा का माल ट्रकों में लादकर बाहर भेजा जाता है. एक ट्रक से 5 लाख रुपए के माल बेचे जाते हैं. इस तरह साल भर में लगभग 24 ट्रक माल भेजकर लगभग डेढ़ करोड़ के आसपास की आमदनी होती है. इस तरह राजन प्रजापति साल में करोड़ों का ट्रांजैक्शन कर कई लोगों के पेट भी भरते हैं और आगे और बड़ा काम करना चाहते हैं.
टूल किट से बढ़ी आमदनी और व्यापार
पन्नेलाल प्रजापति गुलरिया का औरंगाबाद गांव में पुश्तैनी कारोबार है, उनके यहां 5 से 7 मजदूर लगातार काम करते हैं. हाथों से खूबसूरत तेराकोटा की मूर्तियों को सजाते हैं, पकाते हैं. मूर्तियों के पक जाने के बाद संभाल कर रखा जाता है ताकि ट्रकों में माल लाद कर बेचा जा सके. पहले टूल किट नहीं था और सरकार से फ्री टूल किट मिलने के बाद उनकी मुश्किलें आसान हो गई. अब हर महीने लगभग एक ट्रक माल बेच लेते हैं, जो साल भर में 60 से 70 लाख का हो जाता है. इस तरह से यह भी लाखों का काम कर लेते हैं. पन्नेलाल पहले टिन सेट के मकान में रहते थे और आज इनका खुद का अपना पक्का मकान है. आज कारोबार खूब चल रहा है. अभी सरकार से छोटी रकम लेकर उसे चुकता कर चुके हैं. अब बड़ी रकम लेकर और आगे काम बढ़ाना चाहते हैं.
छोटे काश्तकार भी लगभग चार लाख सालाना कमा लेते हैं
हीरालाल प्रजापति ने बताया कि 18 साल हो गया काम करते हुए. पहले भी ऐसे ही था लेकिन अब यहां गवर्नमेंट ने मकान बनवा दिया है. काम करने के लिए सबको एक-एक कमरा एलाट कर दिया है. उन्होंने बताया कि वह लगभग 4 लाख सालाना कमा लेते हैं. वैसे यहां पर 12 दुकान हैं, जहां पर 60-70 लोग काम कर रहे हैं. सारा माल ट्रक से जाता है. अभी मुंबई का काम चल रहा है. अभी बनारस माल भेजे हैं. सारा पैसा खाता में आ जाता है. पार्टी वहीं से खाते में भेज देती है. सब लोग अपना-अपना काम करते हैं. जैसे हम अपना माल भेजते हैं तो मेरा पैसा मेरे पास आता है. इस गांव का नाम औरंगाबाद है.
वन जिला वन प्रोडक्ट के रूप में तेराकोटा को दिलाई गई पहचान
उद्योग आयुक्त उज्ज्वल सिंह ने बताया कि गोरखपुर में वन जिला वन प्रोडक्ट के रूप में तेराकोटा को पहचान दिलाई गई. तेराकोटा चुकी एक परंपरागत विधा है, इसको दृष्टिगत रखते हुए गोरखपुर में तेराकोटा को बढ़ावा दिया जा रहा है. ओडीओपी के अंतर्गत होने से कई तरह के लाभ दिलाया जाता है. ओडीओपी के अंतर्गत प्रशिक्षण कार्यक्रम कराया जाता है और टूलकिट दिया जाता है, जो फ्री होता है. ऐसे भाई-बहन जो प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके हैं, ऐसे लोगों को विभाग द्वारा सब्सिडी उपलब्ध कराई जाती है. विभाग का और सरकार का यह उद्देश्य है कि इस विधा से जुड़े हुए जो भी भाई-बहन हैं, ज्यादा से ज्यादा काम से प्रेरित करते हुए बाजार से जोड़ा जाए. उसी क्रम में सारी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं.