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भारतीय कंज्यूमर का भरोसा बढ़ा, क्या त्योहारों में खुलेगी जेब? 30 देशों में सबसे ऊपर रहा देश का कॉन्फिडेंस इंडेक्स

Consumer Confidence Survey: नौकरी, अपनी आर्थिक स्थिति और निवेश को लेकर भारतीयों का भरोसा सितंबर में बढ़ा है. हालांकि, देश की आगे की आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों के नजरिए में मामूली नरमी आई है.

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त्योहारों का सीजन शुरू होने से पहले भारतीय कंज्यूमर के मूड को लेकर एक अहम संकेत सामने आया है. नौकरी, अपनी आर्थिक स्थिति और निवेश को लेकर लोगों का भरोसा अगस्त के मुकाबले सितंबर में बेहतर हुआ है. Ipsos के कंज्यूमर कॉन्फिडेंस सर्वे के मुताबिक, सितंबर में भारत का कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स 66.9 पर पहुंच गया, जो 30 देशों में सबसे ऊंचा स्कोर है. अगस्त में भारत का कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स 65.3 था. इस तरह एक महीने में इंडेक्स 1.6 पॉइंट बढ़ा है. हालांकि, इस आंकड़े को सीधे लोगों की बढ़ी हुई खरीदारी या खर्च के तौर पर नहीं देखा जा सकता. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स लोगों की नौकरी, निजी वित्तीय स्थिति, निवेश और अर्थव्यवस्था को लेकर सोच और भरोसे को मापता है.

नौकरी-जेब को लेकर भरोसा बढ़ा
सितंबर के सर्वे में सबसे ज्यादा सुधार रोजगार को लेकर भरोसे में आया है. रोजगार के सब-इंडेक्स (Employment sub-index) में 3.7 पॉइंट की बढ़ोतरी हुई. इसके साथ व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति (Personal Financial Conditions Index) में 2.3 पॉइंट और निवेश (Investment Index) में 1.7 पॉइंट की बढ़ोतरी हुई है. मतलब नौकरी और अपनी मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर लोगों का भरोसा अगस्त के मुकाबले बेहतर हुआ है. निवेश को लेकर भी भरोसा बढ़ा है. वहीं आर्थिक उम्मीदों (Economic Expectations Index) में 0.3 पॉइंट की मामूली गिरावट आई है. इससे संकेत मिलता है कि लोग अपनी मौजूदा वित्तीय हालत को लेकर ज्यादा भरोसेमंद हैं, लेकिन देश की आगे की आर्थिक स्थिति को लेकर पूरी तरह बेफिक्र नहीं हुए हैं.

त्योहारों की खरीदारी के लिए क्या मतलब?
सितंबर का ये आंकड़ा ऐसे समय आया है जब देश में फेस्टिव सीजन शुरू होने वाला है. इस दौरान मोबाइल, टीवी, फ्रिज, कार, टू-व्हीलर और दूसरे कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स की खरीदारी बढ़ती है. कंज्यूमर्स के भरोसे में सुधार से इन बड़ी खरीदारी के फैसलों को मदद मिल सकती है. हालांकि, भरोसा बढ़ने का मतलब ये नहीं है कि लोगों ने असल खरीदारी बढ़ा दी है. इसके लिए रिटेल बिक्री, वाहन बिक्री, कंज्यूमर स्पेंडिंग और दूसरे वास्तविक लेनदेन के डेटा को देखना होगा. यही वजह है कि इस सर्वे को फेस्टिव खरीदारी का सीधा अनुमान मानना ठीक नहीं होगा. इसे कंज्यूमर सेंटीमेंट का संकेत माना जा सकता है.

भारत का स्कोर बाकी देशों से कितना आगे?
सितंबर में भारत 30 देशों के बीच कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स में सबसे ऊपर रहा. भारत का स्कोर 66.9 रहा, जबकि स्वीडन 60.0 के स्कोर के साथ दूसरे स्थान पर रहा. Ipsos के मुताबिक, सितंबर में 60 या उससे ज्यादा का National Index हासिल करने वाले देशों में केवल भारत और स्वीडन शामिल रहे. ग्लोबल कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स सितंबर में 48.4 पर स्थिर रहा. Ipsos के मुताबिक, फरवरी के बाद यह पहली बार था जब ग्लोबल इंडेक्स में महीने-दर-महीने बदलाव नहीं हुआ. ऐसे माहौल में भारत के कंज्यूमर कॉन्फिडेंस में 1.6 पॉइंट की बढ़ोतरी खास तौर पर ध्यान खींचती है.

सर्वे में कौन लोग शामिल हुए?
Ipsos का ये ग्लोबल कंज्यूमर कॉन्फिडेंस इंडेक्स हर महीने 30 देशों में किया जाता है. सितंबर के सर्वे में 21,000 से ज्यादा 75 साल से कम उम्र के लोगों को शामिल किया गया. सर्वे 21 अगस्त से 4 सितंबर 2026 के बीच किया गया था. भारत के आंकड़ों को समझते समय एक बात ध्यान में रखना जरूरी है. कंज्यूमर कॉन्फिडेंस का ये आंकड़ा देश की पूरी आबादी की वास्तविक खर्च करने की क्षमता का सीधा माप नहीं है. सर्वे के तरीके और सैंपल को देखते हुए इसे कंज्यूमर सेंटीमेंट के इंडिकेटर के तौर पर देखना ज्यादा सही होगा. फिलहाल सितंबर का डेटा भारतीय कंज्यूमर के लिए एक पॉजिटिव संकेत जरूर देता है. नौकरी, निजी फाइनेंस और निवेश को लेकर भरोसा बढ़ा है. फेस्टिव सीजन में ये भरोसा कितनी खरीदारी में बदलता है, इसकी असली तस्वीर आने वाले महीनों की वास्तविक बिक्री और खर्च के डेटा से साफ होगी.

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