Kaithoon has now become known for its lac bangles
Kaithoon has now become known for its lac bangles
राजस्थान का कैथून कस्बा देश-दुनिया में अपनी प्रसिद्ध कोटा डोरिया साड़ियों के लिए जाना जाता है, लेकिन अब यहां बनने वाले लाख के रंग-बिरंगे चूड़ी भी इसकी नई पहचान बन रहे हैं. जहां एक ओर करघों पर महीन धागों से खूबसूरत साड़ियां बुनी जाती हैं, वहीं दूसरी ओर भट्टियों की तेज आंच के बीच कारीगर महिलाओं के श्रृंगार का अहम हिस्सा माने जाने वाले लाख के चूड़े तैयार कर रहे हैं. यह कला न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार दे रही है, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत को भी सहेज रही है.
भट्टियों की आंच में आकार लेते हैं रंग-बिरंगे चूड़े
कैथून की संकरी गलियों और छोटी-छोटी कार्यशालाओं में सुबह से लेकर देर शाम तक भट्टियां जलती रहती हैं. यहां कारीगर तेज गर्मी और आग की तपिश के बीच लाख को पिघलाकर सुंदर चूड़ियों का रूप देते हैं. शादी-विवाह, तीज-त्योहार और अन्य विशेष अवसरों पर इन चूड़ियों की मांग काफी बढ़ जाती है.
पीढ़ियों से चली आ रही है यह कला
करीब 45 वर्षों से इस काम से जुड़े कारीगर मोहम्मद फारूक बताते हैं कि लाख की चूड़ियां बनाना केवल रोजी-रोटी का साधन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही एक पारंपरिक कला है. चूड़ी बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल जयपुर से मंगवाया जाता है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘चापड़ी’ कहा जाता है.
हाथों से तैयार होती है हर चूड़ी
कारीगर सबसे पहले चापड़ी को बड़ी कढ़ाई में गर्म करके मुलायम बनाते हैं. इसके बाद उसमें अलग-अलग रंग मिलाए जाते हैं. तैयार सामग्री को हाथों से लंबी दांडी का आकार दिया जाता है. फिर इसे दोबारा गर्म कर गोल आकार में ढाला जाता है और चूड़ी तैयार की जाती है. अंतिम चरण में उस पर डिजाइन और सजावट का काम किया जाता है. बाजार की मांग के अनुसार साधारण, डिजाइनर और कई रंगों की चूड़ियां बनाई जाती हैं.
मशीन नहीं होती इस्तेमाल
कारीगरों का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी मशीन का उपयोग नहीं किया जाता. चूड़ी बनाने से लेकर डिजाइन तैयार करने तक हर काम हाथों से किया जाता है. यही वजह है कि हर चूड़ी में कारीगर की मेहनत और कला की अलग पहचान दिखाई देती है.
60 डिग्री तक तापमान में भी जारी है काम
गर्मी के मौसम में भट्टियों के सामने काम करना सबसे बड़ी चुनौती होती है. कई बार कार्यस्थल का तापमान 55 से 60 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है. इसके बावजूद कारीगर पूरे समर्पण के साथ इस कला को जीवित रखने में जुटे हुए हैं. एक कारीगर प्रतिदिन लगभग 120 जोड़ी चूड़ियां तैयार कर लेता है.
कोटा डोरिया के साथ नई पहचान बना रहे लाख के चूड़े
कोटा डोरिया की बुनाई के लिए प्रसिद्ध कैथून में आज दो पारंपरिक कलाएं साथ-साथ जीवित हैं. एक तरफ करघों पर साड़ियां बुनी जा रही हैं, तो दूसरी तरफ भट्टियों की आंच में लाख के खूबसूरत चूड़े तैयार हो रहे हैं. आधुनिक मशीनों के दौर में भी यह हस्तकला स्थानीय कारीगरों की मेहनत, परंपरा और हुनर की मिसाल बनकर राजस्थान की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही है.
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