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Ber Farming: यूट्यूब से मिला आइडिया, बेर की इस खास वैरायटी की खेती, दोगुनी हुई कमाई

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के एक किसान भारत सुंदरी बेर की खेती कर रहे हैं. इससे उनकी कमाई दोगुनी हो गई है. शहंशाह आलम नाम के इस किसान ने बेर की खेती का तरीका यूट्यूब से सीखा है.

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उत्तर प्रदेश में सहारनपुर के नानौता क्षेत्र के किसान शहंशाह आलम परंपरागत खेती से अलग हटकर नई फसलों पर प्रयोग करने के लिए जाने जाते हैं. पेशे से प्रोफेसर होने के बावजूद पिछले 10 सालों से वह बागवानी में नए-नए इस्तेमाल कर रहे हैं. इस बार उन्होंने बेर की खास वैरायटी भारत सुंदरी को अपने खेत में लगाया है, जो दिखने में लाल और बेहद आकर्षक है. शहंशाह आलम को इस वैरायटी का आइडिया यूट्यूब के जरिए मिला. पहले वह हरे रंग के पारंपरिक बेर उगाते थे, लेकिन मंडी में कम दाम मिलने से उन्होंने बदलाव का फैसला लिया. अपनी आय बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने कोलकाता से पौधे मंगवाकर करीब डेढ़ सौ पौधे लगाए.

भारत सुंदरी बेर ही खेती क्यों?
भारत सुंदरी बेर की खासियत यह है कि इसका रंग गहरा लाल होता है, जो ग्राहकों को दूर से ही आकर्षित करता है. स्वाद में यह बेहद मीठा होता है और बाजार में हरे बेर की तुलना में 20 से 30 रुपये प्रति किलो अधिक दाम पर बिकता है. जहां सामान्य बेर 50 से 60 रुपये किलो बिकता है. वहीं, यह वैरायटी 80 से 100 रुपये प्रति किलो तक पहुंच जाती है. किसान का कहना है कि एक साल बाद ही पौधे फल देना शुरू कर देते हैं. उन्होंने इसे 10 बाय 10 की दूरी पर लगाया था, लेकिन पौधे तेजी से फैलकर पूरे खेत में छा गए.

हर साल पेड़ को काटना पड़ता है- शहंशाह आलम
शहंशाह आलम बताते हैं कि इस वैरायटी के पेड़ को हर साल जमीन से लगभग एक फीट ऊपर से काटना पड़ता है. कटाई के छह महीने के भीतर ही पौधा फिर से तेजी से बढ़कर फल देने लगता है. इसकी टहनियां तेजी से फैलती हैं और फलन भी भरपूर होती है. लाल रंग और अधिक मिठास के कारण इसकी मांग लगातार बनी रहती है. खासकर शिवरात्रि और होली के आसपास इसकी डिमांड काफी बढ़ जाती है, क्योंकि मंदिरों में चढ़ाने के लिए लाल बेर को ज्यादा पसंद किया जाता है.

दोगुनी हो गई है कमाई- शहंशाह आलम
किसान शहंशाह आलम का कहना है कि उनकी पूरी फसल बागवान पहले ही खरीद लेते हैं और फिर बाजार में सप्लाई करते हैं. उनका दावा है कि इस नई वैरायटी से उनकी आय लगभग दोगुनी हो गई है. अब आसपास के किसान भी उनसे प्रेरित होकर परंपरागत खेती से हटकर नई फसलों की ओर रुख कर रहे हैं. शहंशाह आलम मानते हैं कि अगर किसान नई तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म से सीख लेकर प्रयोग करें, तो खेती को मुनाफे का बेहतर जरिया बनाया जा सकता है.

(राहुल कुमार की रिपोर्ट)

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