Lawyers Can Take Judge Exams After Just One Year of Practice
Lawyers Can Take Judge Exams After Just One Year of Practice
सुप्रीम कोर्ट ने ज्यूडिशियल सर्विस परीक्षा के नियमों में एक बहुत बड़ा बदलाव किया है. कोर्ट ने तीन साल की अनिवार्य वकालत यानी लीगल प्रैक्टिस की शर्त को एक साल कर दिया है. इस तरह से अब निचली अदालत में जज बनने की परीक्षा देने के लिए वकिल को एक साल की सक्रिय प्रैक्टिस कर लेना भी पर्याप्त होगा. हालांकि परीक्षा पास कर अगले दो साल उन्हें सघन और सक्रिय ट्रेनिंग लेनी होगी. पहले सिविल जज भर्ती परीक्षा में शामिल होने के लिए वकालत की अनिवार्य अवधि तीन साल थी.
2:1 के बहुमत से सुनाया ऐतिहासिक फैसला
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 2:1 के बहुमत से यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया. कोर्ट ने माना कि बिना किसी ट्रांजिशन पीरियड के अचानक तीन साल का नियम लागू करने से युवा वकीलों और लॉ ग्रेजुएट्स को भारी परेशानी हो रही थी. अब 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाले सभी भर्ती नोटिफिकेशन के लिए बिना किसी वकालत के अनुभव (0-Year Practice) के भी लॉ ग्रेजुएट्स परीक्षा दे सकेंगे. उन्हें डीम्ड (Deemed) तौर पर 1 साल की प्रैक्टिस मानकर छूट दी गई है. इसके बाद जारी होने वाले विज्ञापनों के लिए उम्मीदवारों के पास कम से कम एक साल को सत्यापित सक्रिय लीगल प्रैक्टिस होना अनिवार्य होगा.
...तो पूर्ण वेतन और भत्तों के साथ किया जाएगा नियुक्त
केवल एक साल की प्रैक्टिस होने के कारण कोर्ट ने ट्रेनिंग को मजबूत किया है. परीक्षा पास करने वाले उम्मीदवारों को सीधे जज का पदभार नहीं मिलेगा, बल्कि वे ट्रेनी ज्यूडिशियल ऑफिसर कहलाएंगे. इसके पहले एक साल तक उन्हें संबंधित राज्य की ज्यूडिशियल एकेडमी में सघन प्रशिक्षण लेना होगा. इसके बाद अगले एक साल तक उनकी 'स्ट्रक्चर्ड लॉ क्लर्कशिप' होगी. इसमें 6 महीने वे जिला जज और 6 महीने हाईकोर्ट के जज के अधीन काम सीखेंगे. इस ट्रेनिंग और क्लर्कशिप की संतोषजनक रिपोर्ट के बाद ही उन्हें रेगुलर सिविल जज के रूप में पूर्ण वेतन और भत्तों के साथ नियुक्त किया जाएगा.