Students Demanding the Recruitment of Teachers
Students Demanding the Recruitment of Teachers
आज दो... अभी दो... उत्तराखंड राज्य दो... उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौर में गूंजा ये नारा सिर्फ शब्द नहीं था बल्कि यह पहाड़ के हक, पहचान और बेहतर भविष्य की लड़ाई की आवाज थी. लेकिन करीब ढाई दशक बार उत्तराखंड की एक नई पीढ़ी उसी पहाड़ में एक बार फिर नारा लगाने को मजबूर है. फर्क सिर्फ इतना है कि तब मांग थी- उत्तराखंड राज्य दो और आज की Gen Alpha पीढ़ी की मांग है- टीचर दो... आज दो... अभी दो.
9 पद स्वीकृत और 9 ही खाली
नैनीताल के बेतालघाट से इस संबंध में आया वीडियो उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था के उन दावों पर सवाल खड़ा कर रहा है, जिनमें पहाड़ के बच्चों को बेहतर शिक्षा देने की बात कही जाती है. जीजीआईसी बेतालघाट की छात्राओं के हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, लेकिन आज उनके हाथों में अपनी पढ़ाई के हक की आवाज है. स्कूल के उपलब्ध पद विवरण के मुताबिक इंटर स्तर पर प्रवक्ताओं के 9 पद स्वीकृत हैं और चौंकाने वाली बात ये है कि 9 के 9 पद खाली हैं. जी हां, 9 पद स्वीकृत और 9 ही खाली!
खाली पदों की कीमत कौन चुका रहा
स्नातक स्तर पर भी तस्वीर बहुत चिंताजनक है. यहां 10 पद स्वीकृत हैं, लेकिन 5 पद लंबे समय से रिक्त पड़े हैं. यानी सवाल सिर्फ ये नहीं कि स्कूल में कितने शिक्षक नहीं हैं, सवाल ये है कि इन खाली पदों की कीमत कौन चुका रहा है? कीमत चुका रही हैं वो बेटियां जो पहाड़ में रहकर पढ़ना चाहती हैं. वो Gen Alpha बच्चे जो डिजिटल दौर में पैदा हुए हैं, जिनसे दुनिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और भविष्य की नौकरियों की बात कर रही है. लेकिन उनके सामने आज भी सवाल वही है- पढ़ाएगा कौन?
आज भी यह सवाल है सामने खड़ा
एक तरफ हम नई पीढ़ी को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने की बात कर रहे हैं और दूसरी तरफ पहाड़ के सरकारी स्कूलों में शिक्षक के स्वीकृत पद तक खाली पड़े हैं. इन छात्राओं ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है. सरकार और शिक्षा विभाग से साफ मांग है, खाली पड़े सभी शिक्षक और प्रवक्ता पद तत्काल भरे जाएं. क्योंकि उत्तराखंड बनाने वाली पीढ़ी ने अपने बच्चों के बेहतर भविष्य का सपना देखा था और आज की Gen Alpha पीढ़ी उसी सपने का हिसाब मांग रही है. तब पहाड़ की आवाज थी- आज दो... अभी दो... उत्तराखंड राज्य दो. आज पहाड़ की बेटियां कह रही हैं- टीचर दो... आज दो... अभी दो. राज्य मिल गया, लेकिन क्या पहाड़ के बच्चों को उनका भविष्य भी मिला? यही सवाल अब सरकार और शिक्षा विभाग के सामने खड़ा है.