Brahmin Politics in UP
Brahmin Politics in UP
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव साल 2027 में होने हैं. इस चुनाव में यूपी की योगी सरकार जीत दर्ज कर सत्ता में लगातार तीसरी बार वापसी करने की पुरजोर तैयारी में जुटी है. उधर, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी (सपा), मयावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राहुल गांधी की कांग्रेस पार्टी भी इस चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए जुट गई हैं. इस चुनाव में ब्राह्मण मतदाता एक मजबूत वोट बैंक के रूप में देखा जा रहा है. यही कारण है कि राजनीतिक दलों में इस जाति को अपनी ओर करने के लिए होड़ मची हुई है. चाहे सत्तारूढ़ बीजेपी हो, अखिलेश यादव की सपा हो, मायावती की बसपा हो या कांग्रेस हो, सभी ब्राह्मणों को लुभाने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं. इस समय यूपी में हर तरफ ब्राह्मण समाज चर्चा में है.
...तो इसलिए यूपी में ब्राह्मण वोट बैंक है जरूरी
आपको मालूम हो कि यूपी में भले ही ब्राह्मणों की आबादी 12 फीसदी है लेकिन इनका सत्ता में दखल का एक लंबा इतिहास रहा है. इस प्रदेश में 6 ब्राह्मण मुख्यमंत्री बन चुके हैं. यूपी में ब्राह्मण जाति के लोग किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. आपको मालूम हो कि पूर्वांचल, अवध, बुंदेलखंड, पश्चिमी यूपी से लेकर मध्य उत्तर प्रदेश तक लगभग हर क्षेत्र में ब्राह्मण जाति की उल्लेखनीय मौजूदगी है. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यूपी की 403 विधानसभा सीटों में से लगभग 60 विधानसभा सीटों पर ब्राह्मण मतदाता सीधे तौर पर चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की स्थिति में हैं जबकि 100 से अधिक सीटों पर ब्राह्मण मतदाता भले ही संख्या में ज्यादा न हों लेकिन मुखर होने के कारण सियासी माहौल बनाने/बिगाड़ने का माद्दा रखते हैं.
आपको मालूम हो कि उत्तर प्रदेश के एक दर्जन जिलों में ब्राह्मणों की आबादी 20 फीसदी से ज्यादा है. वाराणसी, प्रयागराज, गोरखपुर, चंदौली, महाराजगंज, देवरिया, भदोही, जौनपुर, बस्ती, संत कबीर नगर, अमेठी, बलरामपुर और कानपुर में ब्राह्मण मतदाता 15 फीसदी से ज्यादा है. वोट शेयर की बात करें तो ब्राह्मण जाति की आबादी मुस्लिम और दलितों की आबादी कहीं कम है लेकिन रणनीति के लिहाज से मुस्लिम और दलित सत्ता में उतनी दखल नहीं रखते, जितनी ब्राह्मण रखता है. ऐसे में कोई भी पार्टी इस जाति को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती.
...और बड़ी संख्या में ब्राह्मण मतदाता आए बीजेपी के साथ
देश की आजादी के बाद से लंबे समय तक यूपी में कांग्रेस का मजबूत सामाजिक आधार ब्राह्मण, दलित और मुस्लिम समुदाय को माना जाता था. कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, नारायण दत्त तिवारी से लेकर श्रीपति मिश्र जैसे कई बड़े ब्राह्मण नेता कांग्रेस की पहचान थे. हालांकि 1990 के दशक में मंडल और कमंडल की राजनीति ने प्रदेश की तस्वीर बदल दी. इसके बाद राम मंदिर आंदोलन के बाद बड़ी संख्या में ब्राह्मण वोटर भारतीय जनता पार्टी के साथ आए. अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी व कलराज मिश्र जैसे नेताओं ने ब्राह्मण समाज में पार्टी की मजबूत पकड़ बनाई. साल 2014 के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने गैर-यादव ओबीसी, गैर-जाटव दलित और सवर्ण मतदाताओं का बहुत बड़ा गठबंधन तैयार किया. इसमें ब्राह्मण समाज सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा. इसका बीजेपी को चुनाव में फायदा भी मिला.
किस पार्टी को ब्राह्मण मतदाताओं का कितना मिला साथ
अखिलेश यादव की नई रणनीति
समाजवादी पार्टी को लगता है कि सवर्णों के सबसे बड़े वर्ग में ब्राह्मण का ही कुछ वोट टूटेगा तो उसका वोट बढ़ेगा और सीट बढ़ेगी. इसी को ध्यान में रखते हुए अखिलेश यादव ब्राह्मण सम्मेलन वाले मंच से चुन चुनकर वो घटना याद दिलाते हैं, जिससे ब्राह्मण वोट साधा जा सके. अखिलेश यादव ने तो अयोध्या सीट से पवन पांडेय का अपना प्रत्याशी भी घोषित कर दिया है. अखिलेश यादव ने पीडीए (PDA) का मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक बताया था, लेकिन अब उन्होंने इसकी नई परिभाषा देते हुए पीडीए के पी का मतलब पीड़ित पंडित बताया है. इस तरह से अखिलेश यादव ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
इसी रणनीति के तहत उन्होंने विधानसभा में माता प्रसाद पांडेय को नेता प्रतिपक्ष बनाया. परशुराम जयंती के कार्यक्रम आयोजित किए. ब्राह्मण सम्मेलनों में हिस्सा लिया. अखिलेश यादव हमेशा कहते रहते हैं कि ‘किसी को हाता नहीं भाता है.’ वह हाल के दिनों में ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित कर लगातार यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि समाजवादी पार्टी अब केवल एक जाति की पार्टी नहीं रह गई है. वह श्रीकृष्ण और सुदामा की दोस्ती का जिक्र कर रहे हैं. अखिलेश यादव को यह पता है कि भले ही ब्राह्मण वोटर उन्हें भाजपा के तरह एकमुश्त वोट न दे, लेकिन उसमें थोड़ा बहुत सेंधमारी करने में कामयाब हो जाते हैं तो सत्ता में वापसी की राह आसान हो सकती है. आपको मालूम हो कि सपा ने अपने पीडीए फार्मूले के जरिए 2024 के लोकसभा चुनाव में 80 में से 37 सीटें जीतने में कामयाब रही थी, लेकिन इस बार विधानसभा चुनाव में सपा यह मानती है कि सिर्फ पीडीए के सहारे 2027 की सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं होगा. यही वजह है कि अब ब्राह्मण समाज को अपनी तरफ करने के लिए भरपूर कोशिश कर रही है.
ऐसा प्रयोग कर मायावती बनीं थी सीएम
आपको मालूम हो कि ब्राह्मण वोट बैंक की अहमियत 2007 विधानसभा चुनाव में देखने को मिली थी. उस समय बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने दलित-ब्राह्मण सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग किया था. सतीश चंद्र मिश्रा को ब्राह्मण चेहरा बनाया था और पूरे प्रदेश में सैकड़ों ब्राह्मण सम्मेलन किए थे. नारा दिया गया- ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा. मायावती ने 2007 में रिकॉर्ड 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. दलित-ब्राह्मण गठजोड़ की बदौलत बसपा ने 403 में से 206 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था और मायावती मुख्यमंत्री बनीं थीं. उस समय की सरकार में बड़ी संख्या में ब्राह्मण मंत्रियों को जगह मिली. राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक यूपी की राजनीति में यह सोशल इंजीनियरिंग का सबसे सफल प्रयोग था. यही वजह है कि आज अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी भी उसी मॉडल को अपने तरीके से दोहराने की कोशिश करती दिखाई दे रही है. उधर, बहुजन समाज पार्टी भी एक बार फिर ब्राह्मण मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए जुटी हुई है.
क्या कांग्रेस भी कर सकती है वापसी
आपको मालूम हो कि ब्राह्मण समाज कभी कांग्रेस का सबसे मजबूत वोट बैंक माना जाता था. यदि इस विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और ब्राह्मणों के बीच दूरी बढ़ती है तो कांग्रेस भी खुद को एक विकल्प के रूप में पेश करने की कोशिश कर सकती है. कांग्रेस भी ब्राह्मण नेताओं को आगे लाने की रणनीति पर लगातार काम कर रही है. हालांकि इस चुनाव में मुख्य मुकाबला बीजेपी और सपा में ही होने की संभावना अधिक दिख रही है,
दिलचस्प हो सकता है इस बार का यूपी चुनाव
अब सवाल यह है कि क्या सपा का ब्राह्मणों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास वोटों में बदलेगा या सिर्फ सहानुभूति तक सीमित रहेगा? क्या मनोज पांडेय की मौजूदगी बीजेपी ब्राह्मण वोटों को बनाए रख पाएगी या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) विवाद का असर ज्यादा होगा? क्या समाजवादी पार्टी 2027 में 2022 के मुकाबले कहीं अधिक ब्राह्मण उम्मीदवार उतारेगी? यदि 2027 में सपा और कांग्रेस मिलकर चुनाव लड़ते हैं तो कांग्रेस यूजीसी विवाद और आरक्षण के मुद्दे पर क्या रुख अपनाएगी? इन सवालों के जवाब ही तय कर सकते हैं कि 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव किसके पक्ष में जाएगा. कई राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक साल 2027 का विधानसभा चुनाव पिछले एक दशक का सबसे कड़ा और दिलचस्प चुनाव हो सकता है. अब देखना है कि ब्राह्मण समाज विधानसभा चुनाव 2027 में किसको यूपी की सत्ता पर काबिज करता है.