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लेफ्ट पार्टियों के सिकुड़ रहे आंकड़े, चल रही खत्म होने की कगार पर.. जानें क्या कहते हैं आंकड़े

लेफ्ट पार्टियां जिनका कभी राज्यों में दबदबा रहा करता था. आज उनकी हालत ऐसी है कि उनको जो आंकड़े ऐसे हैं जिनको देख उनका वजूद कब तक रहेगा, यह बड़ा सवाल है.

पिछले कुछ दशकों में भारत में वाम दलों की पकड़ लगातार कमजोर हुई है (Photo: ITG) पिछले कुछ दशकों में भारत में वाम दलों की पकड़ लगातार कमजोर हुई है (Photo: ITG)

पश्चिम बंगाल की बात करें तो यहां हमेशा मुकाबल TMC और BJP के बीच रहता है. तमिल, असम और पुडुचेरी की बात करें तो यहां लेफ्ट के लिए केवल थोड़ी ही जगह बचती है. लेकिन 2026 ने केरल में लेफ्ट की कहानी को पूरी तरह बदल दिया. यहां लेफ्ट का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया है.

पश्चिम बंगाल में नैया किनारे पर
पश्चिम बंगाल की बात करें तो 2026 में लेफ्ट केवल दो सीटों के साथ आगे चल रहा है. जिसमें केवल 4.4 प्रतिशट वोट शेयरिंग है.  यहां लड़ाई सीधे तौर पर टीएमसी और बंगाल के बीच है. यहां लेफ्ट के जगह खत्म ही है एक तरह से.

लेफ्ट वहीं पार्टी है जिसने बंगाल में लगातार 34 साल तक राज किया है. यहां 2006 में पार्टी ने 227 सीट से साथ जीत दर्ज की थी. पार्टी का वोट शेयर उस 48.4 प्रतिशत रहा था. यानी एक तरह से बंगाल में पड़ने वाले हर वोट में आधा हिस्सा लेफ्ट का था.

लेकिन 2011 का वो साल लेफ्ट शायद ही कभी भूल सके, जब ममता की टीएमसी ने लेफ्ट की स्ट्रीक को तोड़ दिया था. उस साल के बाद बंगाल मेें लेफ्ट की जीत गिरती ही चली गई. साल 2011 में केवल 60 सीट, 2016 में 32 सीट, 2021 में शून्य और 2026 में केवल 4.4 प्रतिशत वोट शेयर.

केरल में भी प्रदर्शन निराशाजनक
2026 में केरल विधानसभा चुनावों में पहली बार है कि पार्टी का वोट शेयर 30 प्रतिशत से भी कम रहा है. यह वही पार्टी है जो पांच साल पहले 34.3 प्रतिशत वोट शेयर के साथ थी.  

त्रिपुरा से खत्म होती पार्टी
त्रिपुरा भी कुछ ऐसी ही कहानी है. यहां CPI(M), जिसने दो दशकों तक राज्य पर राज किया, 2013 में 49 सीटें जीती थीं. लेकिन 2018 में, BJP ने उस वर्चस्व को खत्म कर दिया, और CPI(M) सिमटकर 16 सीटों पर आ गई. कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया, रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी और फॉरवर्ड ब्लॉक उस साल अपना खाता भी नहीं खोल पाए; और तब से लेकर अब तक यह सिलसिला बदला नहीं है.