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RSS के विवादों और इतिहास पर आधारित संजय दत्त की फिल्म हुई रिलीज, जानें कैसे है रिव्यू, क्या 'आखिरी सवाल' ने छोड़ा जनता पर असर?

जानें कैसा है संजय दत्त की फिल्म आखिरी सवाल का रिव्यू.

Aaakhiri Sawal review Aaakhiri Sawal review

संजय दत्त स्टारर फिल्म 'आखिरी सवाल' आज सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है. यह फिल्म किसी मनोरंजन या मसालेदार कहानी पर नहीं, बल्कि एक ऐसे विषय पर बनी है, जिस पर अकसर लोगों और विचारकों के बीच बहस छिड़ती रही है. फिल्म की कहानी राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) और उससे जुड़े सवालों के इर्द-गिर्द घूमती है. लंबे समय से राजनीतिक मंचों, यूनिवर्सिटी बहसों और इतिहास की किताबों में जिस संगठन पर चर्चा होती रही, उसी को फिल्म में केंद्र में रखा गया है.

फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि संघ पर लगे आरोपों और विवादों को किस नजरिए से देखा जा सकता है. हालांकि यह कहानी दर्शकों को एक खास सोच और बहस के बीच ले जाती है.

पांच सवालों से खुलती है कहानी की परतें
फिल्म की शुरुआत प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी और उनके छात्र विक्की हेगड़े के बीच टकराव से होती है. प्रो. गोपाल का किरदार संजय दत्त ने निभाया है, जबकि विक्की के रोल में नमाशी चक्रवर्ती नजर आते हैं.

कहानी तब मोड़ लेती है जब विक्की संघ को देशद्रोही बताते हुए अपनी थीसिस तैयार करता है, लेकिन प्रोफेसर गोपाल उसे रद्द करवा देते हैं. इस बात पर दोनों के बीच बहस बढ़ जाती है. मामला इतना गरमा जाता है कि प्रोफेसर, विक्की को थप्पड़ मार देते हैं. यही घटना कॉलेज कैंपस में छात्रों के गुस्से की वजह बनती है और विरोध प्रदर्शन शुरू हो जाता है.

इसके बाद कहानी एक दिलचस्प मोड़ पकड़ती है. विक्की, प्रोफेसर गोपाल के सामने संघ से जुड़े पांच सवाल रखता है. इन सवालों के जरिए फिल्म महात्मा गांधी की हत्या, बाबरी विध्वंस, संघ पर लगे प्रतिबंध और दूसरे ऐतिहासिक विवादों को छूती है. शुरुआती सवाल कॉलेज परिसर में होते हैं, जबकि बाकी सवाल लाइव टीवी डिबेट के दौरान पूछे जाते हैं.

अभिनय में किसने छोड़ी छाप?
फिल्म में संजय दत्त कई जगह अपने किरदार में जमे हुए दिखते हैं, खासकर शुरुआत में. हालांकि कुछ दृश्यों में ऐसा महसूस होता है कि किरदार से ज्यादा उनकी अपनी स्टार छवि हावी होने लगती है. गुस्से वाले दृश्यों में उनका अभिनय थोड़ा जरूरत से ज्यादा ऊंचा नजर आता है.

वहीं नमाशी चक्रवर्ती ने अपने किरदार से ध्यान खींचा है. उन्होंने एक जिद्दी और सवाल करने वाले छात्र की भूमिका को काफी संतुलित तरीके से निभाने की कोशिश की है. सहायक कलाकारों में अमित साध और नीतू चंद्रा सीमित समय के लिए नजर आते हैं, लेकिन ठीक काम करते हैं. समीरा रेड्डी का किरदार अलग अंदाज का है और उनके रोल के नेगेटिव शेड्स स्क्रीन पर साफ दिखाई देते हैं.

कहां कमजोर पड़ती दिखी फिल्म?
फिल्म एक गंभीर राजनीतिक और ऐतिहासिक मुद्दे को उठाती है, लेकिन हर दर्शक वर्ग को यह अपनी ओर खींच पाए, ऐसा जरूरी नहीं लगता. खासकर वे लोग जो वीकेंड पर कुछ मनोरंजन या दमदार ड्रामा देखने जाते हैं, उन्हें यह फिल्म थोड़ी भारी लग सकती है.

म्यूजिक और बैकग्राउंड
फिल्म का संगीत मोंटी शर्मा ने तैयार किया है, जबकि गीत कुमार विश्वास ने लिखे हैं. हालांकि गाने और संगीत कहानी को बहुत ज्यादा मजबूती देते नहीं दिखते. कुछ जगह बैकग्राउंड म्यूजिक जरूरत से ज्यादा डाल दिया गया ऐसा महसूस होता है.

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