
Coffee With Commandos
Coffee With Commandos
सुकमा के घने जंगलों में कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी. यहां सुरक्षा बलों, DRG और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ आम बात थी लेकिन आज उसी इलाके में एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जो बस्तर के बदलते दौर की सबसे बड़ी पहचान बन चुकी है. कॉफी विद कमांडो की यह तस्वीर सिर्फ एक कैफे की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलाव की मिसाल है, जहां कभी बंदूक उठाने वाले हाथ अब कॉफी कप थामे दिखाई दे रहे हैं. सुकमा के नेचर कैफे में DRG यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड के कमांडो बैठकर कॉफी पीते हैं और यह कॉफी उन्हीं महिलाओं के हाथों से बनकर आती है, जो कभी नक्सली संगठन का हिस्सा थीं. कई महिलाओं ने 10 से 15 साल तक जंगलों में नक्सली गतिविधियों में हिस्सा लिया, लेकिन अब वे मुख्यधारा से जुड़कर नई जिंदगी की शुरुआत कर चुकी हैं. यह दृश्य सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि बस्तर में चल रहे सबसे बड़े परिवर्तन का प्रतीक है.
जिनसे कभी मुठभेड़ होती थी, आज उन्हें कॉफी परोस रहीं महिलाएं
एक समय था जब DRG के जवान इन्हीं नक्सलियों के खिलाफ जंगलों में ऑपरेशन चलाते थे. दोनों आमने-सामने होते थे. मुठभेड़ों में गोलियां चलती थीं और जान का खतरा हर पल बना रहता था लेकिन आज हालात बदल चुके हैं. सरेंडर कर चुकी महिलाएं अब नेचर कैफे चला रही हैं. वे खुद कुकिंग करती हैं, कॉफी बनाती हैं और पर्यटकों व जवानों का स्वागत करती हैं. सबसे खास बात यह है कि जिन DRG कमांडो के साथ कभी उनकी मुठभेड़ होती थी, आज वही जवान उनके कैफे में बैठकर कॉफी पीते हैं. यह बदलाव अचानक नहीं आया. इसके पीछे सरकार, सुरक्षा बलों और पुनर्वास नीति की लंबी प्रक्रिया है. आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को सिर्फ हथियार छोड़ने के लिए नहीं कहा गया, बल्कि उन्हें सम्मानजनक जीवन देने की कोशिश भी की गई. रोजगार, प्रशिक्षण और समाज से जोड़ने के प्रयासों ने इस बदलाव को संभव बनाया.

बस्तर में बदलाव की सबसे बड़ी ताकत बना DRG
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जारी लड़ाई में यदि किसी बल ने सबसे ज्यादा प्रभाव छोड़ा है तो वह है DRG यानी डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड. बस्तर के स्थानीय आदिवासी युवाओं और सरेंडर कर चुके पूर्व नक्सलियों से बने इस विशेष बल ने नक्सलवाद के खिलाफ अभियान की तस्वीर ही बदल दी. करीब एक दशक पहले गठित DRG को विशेष रूप से नक्सल प्रभावित इलाकों में ऑपरेशन के लिए तैयार किया गया था. शुरुआत में इसे एक प्रयोग के तौर पर देखा गया, लेकिन आज यह बल नक्सल विरोधी अभियानों की सबसे बड़ी ताकत बन चुका है. DRG की सबसे बड़ी ताकत उसका लोकल कनेक्शन है. जवान स्थानीय भाषा, संस्कृति, गांवों की संरचना, जंगलों के रास्ते और इलाके की परिस्थितियों को बेहतर तरीके से समझते हैं. यही वजह है कि वे अबूझमाड़ जैसे दुर्गम इलाकों में भी प्रभावी कार्रवाई करने में सफल रहे.
DRG की स्थानीय समझ ने बदल दी थी बस्तर में ऑपरेशन की रणनीति
पहले सुरक्षा बलों को बस्तर के घने जंगलों में कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता था. इलाके की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन थीं और नक्सलियों को स्थानीय समर्थन भी मिलता था, लेकिन DRG के आने के बाद तस्वीर बदलने लगी. स्थानीय युवाओं की भर्ती से सुरक्षा बलों को गांवों की सही जानकारी मिलने लगी. जंगलों के गुप्त रास्ते, नक्सलियों के मूवमेंट और संभावित ठिकानों की पहचान आसान हुई. इससे ऑपरेशन ज्यादा इंटेलिजेंस बेस्ड और मिशन ओरिएंटेड बन गए. आज DRG सिर्फ एक सुरक्षा बल नहीं, बल्कि बस्तर की सामाजिक और रणनीतिक समझ का सबसे मजबूत चेहरा बन चुका है.
सरेंडर नक्सलियों ने मजबूत किया इंटेलिजेंस नेटवर्क
नक्सल विरोधी अभियानों में सबसे अहम भूमिका खुफिया जानकारी की होती है. सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि हाल के वर्षों में मिली बड़ी सफलताओं के पीछे मजबूत इंटेलिजेंस नेटवर्क सबसे बड़ा कारण रहा है. सरेंडर कर चुके नक्सलियों से सुरक्षा बलों को संगठन की रणनीति, ठिकानों और हथियारों की जानकारी मिली. इससे कई बड़े ऑपरेशन सफल हुए. पूर्व नक्सलियों की भर्ती और पुनर्वास ने भी सुरक्षा बलों को अंदरूनी जानकारी हासिल करने में मदद की. अधिकारियों के मुताबिक, जंगलों में नक्सलियों के मूवमेंट की सटीक जानकारी मिलने से सुरक्षा बलों की रणनीति अधिक प्रभावी हुई है. यही कारण है कि हाल के वर्षों में कई बड़े नक्सली कमांडर मारे गए या गिरफ्तार हुए.
जंगल वारफेयर में माहिर DRG
DRG जवानों को विशेष जंगल वारफेयर और गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी जाती है. उन्हें उन्हीं परिस्थितियों में लड़ने के लिए तैयार किया जाता है, जिनका इस्तेमाल नक्सली करते हैं. घने जंगलों में लंबी दूरी तक पैदल ऑपरेशन, रात में मूवमेंट, पहाड़ी इलाकों में कॉम्बैट और इंटेलिजेंस आधारित कार्रवाई DRG की विशेषता बन चुकी है. हाल के वर्षों में बीजापुर, दंतेवाड़ा, नारायणपुर और कांकेर में हुए कई बड़े ऑपरेशनों में DRG ने केंद्रीय बलों CRPF, CoBRA, STF और BSF के साथ मिलकर बड़ी सफलता हासिल की. इन अभियानों ने नक्सलियों के सबसे मजबूत नेटवर्क को कमजोर किया और बस्तर में सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत हुई. मई 2025 में हुए उस बड़े ऑपरेशन को बस्तर में नक्सलवाद के खिलाफ निर्णायक मोड़ माना जाता है, जिसमें शीर्ष माओवादी नेता बसवा राजू मारा गया था. इस कार्रवाई में DRG की भूमिका बेहद अहम रही. सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, ऑपरेशन पूरी तरह इंटेलिजेंस आधारित था. कई दिनों तक जंगलों में निगरानी और मूवमेंट ट्रैक करने के बाद कार्रवाई की गई. इस ऑपरेशन ने नक्सली संगठन को बड़ा झटका दिया. बसवा राजू की मौत को सुरक्षा बलों ने नक्सलवाद के खिलाफ सबसे बड़ी सफलताओं में गिना. इसके बाद बड़ी संख्या में नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया और कई इलाकों में संगठन का प्रभाव कमजोर पड़ने लगा.

बंदूक से विकास की ओर बढ़ता बस्तर
बस्तर में अब सिर्फ सुरक्षा अभियान ही नहीं चल रहे, बल्कि विकास और पुनर्वास की नई कहानी भी लिखी जा रही है. सड़क, मोबाइल नेटवर्क, स्कूल, स्वास्थ्य सेवाएं और रोजगार के अवसर तेजी से बढ़े हैं. नेचर कैफे जैसे प्रयास इसी बदलाव का हिस्सा हैं. सरकार और सुरक्षा बल यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि जो लोग हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौटना चाहते हैं, उनके लिए नए अवसर मौजूद हैं. पूर्व नक्सलियों को रोजगार से जोड़ना सिर्फ आर्थिक पहल नहीं, बल्कि विश्वास बहाली की प्रक्रिया भी है. जब समाज उन्हें स्वीकार करता है, तभी स्थायी शांति की नींव मजबूत होती है.
कॉफी विद कमांडो बना नई शुरुआत का प्रतीक
सुकमा का यह कैफे अब सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि बदलाव की जीवंत मिसाल बन चुका है. यहां आने वाले लोग सिर्फ कॉफी नहीं पीते, बल्कि बस्तर के बदलते इतिहास को महसूस करते हैं. DRG कमांडो और पूर्व नक्सलियों का एक साथ बैठना इस बात का संकेत है कि बस्तर अब हिंसा छोड़ अब आगे बढ़ रहा है. जिन हाथों में कभी AK-47 हुआ करती थी, वे आज कॉफी कप थामे मुस्कुराते दिखाई देते हैं. यह बदलाव आसान नहीं था. इसके पीछे वर्षों की रणनीति, ऑपरेशन, पुनर्वास और विश्वास की प्रक्रिया रही है लेकिन आज बस्तर की तस्वीर धीरे-धीरे बदल रही है.
नई पहचान गढ़ रहा है बस्तर
कभी नक्सल हिंसा के लिए पहचाना जाने वाला बस्तर अब बदलाव, पुनर्वास और विकास की नई पहचान बना रहा है. सुरक्षा बलों की रणनीति अब सिर्फ ऑपरेशन तक सीमित नहीं, बल्कि लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने पर भी केंद्रित है. DRG ने यह साबित किया है कि स्थानीय भागीदारी के बिना नक्सलवाद जैसी चुनौती से पूरी तरह नहीं निपटा जा सकता. स्थानीय युवाओं और सरेंडर नक्सलियों को साथ लेकर जो मॉडल तैयार किया गया, उसने बस्तर में सुरक्षा और विश्वास दोनों को मजबूत किया. कॉफी विद कमांडो की यह कहानी सिर्फ एक कैफे की कहानी नहीं है, यह उस बस्तर की कहानी है जो बंदूक की आवाज से निकलकर विकास, विश्वास और नई उम्मीद की तरफ बढ़ रहा है.