Delhi AIIMS
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राजधानी दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) एक बार फिर चिकित्सा क्षेत्र में नई उपलब्धि की दिशा में कदम बढ़ा रहा है. संस्थान अब फेस ट्रांसप्लांट यानी चेहरे के प्रत्यारोपण की तैयारी कर रहा है. यह एक जटिल और बेहद संवेदनशील प्रक्रिया मानी जाती है, जिसके लिए कई विशेषज्ञ विभागों की संयुक्त मेहनत जरूरी होती है. एम्स ने इस दिशा में औपचारिक तैयारी शुरू कर दी है और उम्मीद जताई जा रही है कि यदि सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो अगले एक साल के भीतर पहला फेस ट्रांसप्लांट किया जा सकेगा.
कई विभाग मिलकर करेंगे काम
फेस ट्रांसप्लांट एक ऐसा ऑपरेशन है जिसमें सिर्फ एक विभाग नहीं, बल्कि कई विशेषज्ञों की टीम साथ काम करती है. एम्स में करीब 10 से 12 विभाग इस तैयारी में शामिल किए गए हैं. इस पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व प्लास्टिक सर्जरी विभाग कर रहा है. डॉक्टरों के अनुसार, ऑपरेशन से पहले और बाद की देखभाल में अलग-अलग विशेषज्ञों की भूमिका अहम होती है, इसलिए टीमवर्क पर खास ध्यान दिया जा रहा है.
डॉक्टरों की ट्रेनिंग और तकनीकी तैयारी
प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख डॉ. मनीष सिंघल ने बताया कि संस्थान व्यवस्थित तरीके से तैयारी कर रहा है. डॉक्टरों को विशेष ट्रेनिंग दी जा रही है ताकि इस जटिल प्रक्रिया को सुरक्षित ढंग से पूरा किया जा सके. वहीं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शिवांगी शाह ने कहा कि फेस ट्रांसप्लांट पूरी तरह टीम आधारित प्रक्रिया है, जिसमें हर विभाग की भूमिका पहले से तय की जा रही है. स्क्रिप्ट रीडिंग, मेडिकल प्लानिंग और प्रैक्टिकल ट्रेनिंग जैसे चरणों पर काम चल रहा है.
डोनर और पोस्ट-सर्जरी देखभाल अहम
फेस ट्रांसप्लांट के लिए सबसे जरूरी हिस्सा उपयुक्त डोनर का मिलना है. डोनर उपलब्ध होने के बाद ही प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है. ऑपरेशन के बाद मरीज की लंबी निगरानी और इलाज की जरूरत होती है. इसी कारण अलग-अलग विभागों को पहले से तैयार किया जा रहा है, ताकि किसी भी मेडिकल चुनौती का तुरंत समाधान हो सके.
देश के लिए संभावित ऐतिहासिक कदम
एम्स के डॉक्टरों का मानना है कि यदि यह प्रयास सफल होता है, तो यह न सिर्फ संस्थान बल्कि पूरे देश के लिए बड़ी उपलब्धि होगी. योजना के अनुसार, अगले एक साल में पहला फेस ट्रांसप्लांट करने का लक्ष्य रखा गया है. सफल होने पर दिल्ली एम्स भारत का पहला अस्पताल बन सकता है जहां यह जटिल प्रक्रिया की जाएगी, जो भारतीय चिकित्सा क्षेत्र में एक अहम मील का पत्थर साबित हो सकती है.
(रिपोर्ट- आशुतोष कुमार)
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