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150 साल बाद दिखा ये दुर्लभ सांप, वन विभाग और विशेषज्ञ हैरान

गुजरात के कच्छ इलाके से वन्यजीव प्रेमियों के लिए गुड न्यूज है. कच्छ में 150 साल बाद एक दु्लभ सांप दिखाई दिया है. इससे वन विभाग और विशेषज्ञ हैरान हैं. इससे पहले कच्छ में इस सांप की मौजूदगी आखिरी बार महान चेक जीवाश्म विज्ञानी फर्डिनेंड स्टोलिक्ज़्का ने वर्ष 1872 में दर्ज की थी.

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Afro-Asian sand snake Afro-Asian sand snake

गुजरात के कच्छ से वन्यजीव प्रेमियों और वैज्ञानिकों के लिए एक बेहद रोमांचक खबर सामने आई है. यहां एक ऐसा दुर्लभ सांप देखा गया है, जिसे आखिरी बार डेढ़ सदी से भी अधिक समय पहले रिकॉर्ड किया गया था. इस सांप का नाम 'अफ्रो-एशियन सैंड स्नेक' है, जिसकी कच्छ के शुष्क परिदृश्य में शानदार वापसी ने विशेषज्ञों और वन विभाग दोनों को सुखद आश्चर्य में डाल दिया है.

दिखाई दिया अफ्रो-एशियन सैंड स्नेक-
यह दिलचस्प घटना 6 सितंबर की शाम की है, जब भुज नॉर्थ रेंज के वन अधिकारी जयेश दुमड़िया और उनकी टीम कच्छ के सबसे ऊंचे बिंदु, काला डूंगर के पास गश्त से लौट रहे थे. गोधूलि बेला में उनके वाहन के सामने अचानक एक पतला और तेज रेंगने वाला सांप आ गया. यह सांप उनके लिए बिल्कुल नया था, इसलिए अधिकारी ने तुरंत इसकी तस्वीरें और वीडियो अपने कैमरे में कैद कर लिए. जब इन सबूतों को पहचान के लिए वैज्ञानिकों और सर्प विशेषज्ञों को भेजा गया, तो सभी ने एक स्वर में इसके 'अफ्रो-एशियन सैंड स्नेक' होने की पुष्टि की.

150 साल बाद कच्छ में दिखा दुर्लभ सांप-
कच्छ के इतिहास में इस सांप की मौजूदगी आखिरी बार महान चेक जीवाश्म विज्ञानी फर्डिनेंड स्टोलिक्ज़्का ने वर्ष 1872 में दर्ज की थी. तब से लेकर आज तक, इस क्षेत्र में इसे देखे जाने की कोई आधिकारिक और पुख्ता पुष्टि नहीं हुई थी. लगभग 150 साल बाद इस प्रजाति का दोबारा दिखना वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है.

हल्का विषैला होता है ये सांप-
अफ्रो-एशियन सैंड स्नेक की भौगोलिक पहुंच काफी विस्तृत है. यह मुख्य रूप से भारत में गुजरात और राजस्थान के शुष्क इलाकों के साथ-साथ पश्चिम एशिया और अफ्रीका के तटीय क्षेत्रों में पाया जाता है. स्वभाव की बात करें तो यह हल्का विषैला सांप है, लेकिन इंसानों के लिए यह आमतौर पर बिल्कुल भी खतरनाक नहीं होता है. यह जीव मुख्य रूप से दिन के समय शिकार पर निकलता है और छिपकलियों, चूहों तथा छोटे पक्षियों को अपना निवाला बनाता है.

आज भी छिपे हैं अनछुए रहस्य-
कच्छ के वन संरक्षक धीरज मित्तल ने इस खोज को एक बहुत बड़ी उपलब्धि बताया है. उनका कहना है कि 1872 के एक ऐतिहासिक सर्वेक्षण रिकॉर्ड को इतने सालों बाद भौतिक रूप से सत्यापित करना कोई छोटी बात नहीं है. यह दुर्लभ घटना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि कच्छ का सूखा और बंजर दिखने वाला इलाका असल में अनूठी जैव विविधता से भरा हुआ है, जिसके कई अनछुए रहस्य आज भी दुनिया की नजरों से छिपे हैं.

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