71 जिलों से सामने आईं लाखों दुर्लभ धरोहरें
71 जिलों से सामने आईं लाखों दुर्लभ धरोहरें
प्राचीन ज्ञान परंपरा को संरक्षित करने की दिशा में उत्तर प्रदेश की एक बड़ी उपलब्धि सामने आई है. ज्ञान भारतम् मिशन के तहत प्रदेश के विभिन्न जिलों से अब तक 12 लाख 20 हजार 432 से अधिक पांडुलिपियों की जानकारी ज्ञान भारतम् पोर्टल पर अपलोड की जा चुकी है. सदियों पुरानी धार्मिक, दार्शनिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक धरोहरों को डिजिटल स्वरूप में सुरक्षित करने के इस अभियान ने उत्तर प्रदेश को देश में पांडुलिपि संरक्षण के क्षेत्र में अग्रणी राज्यों की कतार में खड़ा कर दिया है.
प्रदेश के 'संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री जयवीर सिंह' ने ज्ञान भारतम् पोर्टल पर अपलोड की गई पांडुलिपियों के बारे में मंगलवार को जानकारी देते हुए बताया कि 71 जिलों के आंकड़ों के अनुसार वाराणसी 3,12,724 पांडुलिपियों के साथ प्रदेश में पहले स्थान पर है. इन पांडुलिपियों में अध्यात्म, दर्शन, आयुर्वेद, चिकित्सा, धर्मशास्त्र, वेद, ज्योतिष, कर्मकांड, तंत्र, कृषि तथा बर्मी लिपि में लिखी भगवान बुद्ध से संबंधित दुर्लभ ग्रंथ शामिल हैं. इनमें संस्कृत भाषा में लिखे वेद साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ जैसे ऋग्वेद संहिता, ऋग्वेद पदपाठ, ऐतरेय ब्राह्मण, ऐतरेय आरण्यक भाष्य, रुद्री, शांति मंत्र, पवमान सूक्त तथा शुक्ल यजुर्वेद से संबंधित विभिन्न पांडुलिपियां विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं.
वेद साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथ
इसके बाद अयोध्या में 2,44,644 तथा रामपुर में 2,32,735 पांडुलिपियों का विवरण दर्ज किया गया है. प्रयागराज से 90,114, सिद्धार्थनगर से 58,006, सहारनपुर से 41,235, मथुरा से 39,765 और लखनऊ से 34,758 पांडुलिपियों की जानकारी पोर्टल पर अपलोड की गई है. इसके अलावा बलिया (25,184), इटावा (25,000), सीतापुर (24,922), गोरखपुर (14,494), मऊ (11,671), आगरा (9,627) और फर्रुखाबाद (8,978) जैसे जिलों ने भी उल्लेखनीय योगदान दिया है.
इस मिशन के अंतर्गत महोबा से 6,019, उन्नाव से 5,347, बागपत से 5,009, फिरोजाबाद से 3,105, अलीगढ़ से 2,500, आजमगढ़ से 2,390, बाराबंकी से 1,989, ललितपुर से 1,788, जालौन से 1,652 और कानपुर नगर से 1,510 पांडुलिपियों का विवरण दर्ज किया गया है. वहीं गाजीपुर, संभल, सोनभद्र, प्रतापगढ़, कुशीनगर, बस्ती, मुजफ्फरनगर, कन्नौज, चित्रकूट और अंबेडकरनगर सहित अन्य जिलों से भी बड़ी संख्या में पांडुलिपियों की जानकारी प्राप्त हुई है। यह आंकड़े प्रदेश की सांस्कृतिक और बौद्धिक विरासत की व्यापकता को दर्शाते हैं.
250 वर्ष पुरानी चित्रयुक्त गीता ने खींचा ध्यान
ज्ञान भारतम् मिशन के दौरान कई दुर्लभ और ऐतिहासिक पांडुलिपियां भी सामने आई हैं. इनमें सन् 1640 ईस्वी की हरिवंश पुराण पांडुलिपि विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसे महाभारत का अंतिम अठारहवां पर्व माना जाता है. इसी प्रकार सन् 1867 ईस्वी की अत्यंत लघु आकार वाली श्रीमद्भगवद्गीता पांडुलिपि भी आकर्षण का केंद्र है, जिसमें गीता के सभी 700 श्लोक चित्रों सहित अंकित हैं. लगभग 250 वर्ष पुरानी श्रीमद्भगवद्गीता एवं विविध स्तोत्र पांडुलिपि में भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित सुंदर चित्र भी प्रदर्शित हैं.
विष्णु पुराण और ताड़पत्र पांडुलिपियां बनीं धरोहर
मिशन के अंतर्गत संरक्षित अन्य महत्वपूर्ण पांडुलिपियों में सन् 1840 ईस्वी की विष्णु पुराण पांडुलिपि और लगभग 200 वर्ष पुरानी ताड़पत्र पर लिखित पुरुषोत्तम माहात्म्य शामिल हैं. विष्णु पुराण में भगवान विष्णु से संबंधित पौराणिक कथाओं का विस्तृत वर्णन मिलता है, जबकि पुरुषोत्तम माहात्म्य में भगवान श्रीकृष्ण की उपासना पद्धति और धार्मिक महत्व का उल्लेख है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी दुर्लभ पांडुलिपियों का संरक्षण भारतीय संस्कृति, इतिहास और दर्शन के अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है.
संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री ने बताया कि, ज्ञान भारतम् मिशन का उद्देश्य देशभर में उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों का सर्वेक्षण, पहचान, संरक्षण और डिजिटलीकरण करना है. इसके अंतर्गत संस्थागत और निजी संग्रहों में सुरक्षित पांडुलिपियों का सूचीकरण, दस्तावेजीकरण तथा डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जा रहा है. साथ ही पांडुलिपियों के संरक्षण, भाषाई अध्ययन, अनुवाद, अनुसंधान, प्रकाशन और जन-जागरूकता से जुड़े कार्य भी मिशन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. ज्ञान भारतम् मिशन के माध्यम से उत्तर प्रदेश न केवल अपनी हजारों वर्षों पुरानी ज्ञान परंपरा को संरक्षित कर रहा है, बल्कि उसे आधुनिक तकनीक के जरिए नई पीढ़ी और दुनिया भर के शोधार्थियों तक पहुंचाने का कार्य भी कर रहा है.
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