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हेयर स्ट्रेटनिंग क्रीम से कैंसर का खतरा, इस तरह खून में शामिल हो रहे कैमिकल्स

नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट के जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक जिन महिलाओं ने पिछले 12 महीनों में बालों को सीधा करने वाले रासायनिक उत्पादों का इस्तेमाल किया उनमें लगभग 4% गर्भाशय के कैंसर देखा गया.

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Hair straightening creams associated with cancer risk Hair straightening creams associated with cancer risk
हाइलाइट्स
  • यूटरीन कैंसर एक दुर्लभ किस्म का कैंसर है.

  • जो महिलाएं केमिकल हेयर स्ट्रेटनर का इस्तेमाल करती हैं, उनमें कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है.

महिलाओं द्वारा बालों को स्ट्रेट कराने का चलन इन दिनों खूब बढ़ गया है. परमानेंट हेयर स्ट्रेटनिंग से आपके बाल भले ही काफी खूबसूरत, मैनेजेबल और स्टाइलिश लगें लेकिन इसके इस्‍तेमाल के बाद बालों को नुकसान भी हो सकता है. हेयर स्‍ट्रेटनिंग प्रक्रिया में जिस तरह के केमिकल सॉल्यूशन का प्रयोग किया जाता है उससे कैंसर का खतरा होता है. हाल ही में हुए एक अध्ययन में अमेरिकी शोधकर्ताओं ने दावा किया है कि बाल सीधा करने के लिए लगाई जाने वाली क्रीम में मिले रसायन गर्भाशय के कैंसर के जोखिम को दोगुना कर सकते हैं. 

महिलाओं में सबसे आम कैंसर है गर्भाशय का कैंसर

दुनियाभर में करीब 5 लाख महिलाएं हर साल गर्भाशय के कैंसर से पीड़ित होती हैं. 85 फीसद महिलाओं को विकाशशील देशों में गर्भाशय कैंसर का जोखिम होता है. 30 से 59 साल की उम्र के बीच भारत में 36 फीसद महिलाएं में गर्भाशय कैंसर का खतरा रहता है. जिन महिलाओं का बीएमआई (BMI) 5 प्वाइंट अधिक होता है, उनमें गर्भाशय के कैंसर का खतरा 88 फीसदी तक अधिक होता है. गर्भाशय के कैंसर यानी डिम्बग्रंथि के कैंसर के दौरान, सूजन, पेशाब में जलन, भूख न लगना, अनियमित पीरियड्स और वजन कम होने जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है. यह महिला प्रजनन प्रणाली का सबसे आम कैंसर है.

इस तरह खून में पहुंचता है कैंसर
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ द्वारा किए गए अध्ययन के दौरान अमेरिका में 33 हजार महिलाओं की एक दशक से अधिक समय तक निगरानी की गई. शोधकर्ताओं ने बताया कि साल में चार या उससे ज्यादा बार हेयर स्ट्रेटनिंग उत्पादों का इस्तेमाल करने वाली महिलाओं में गर्भाशय कैंसर की दर 4.05 प्रतिशत थी, जबकि ऐसा न करने वाली महिलाओं में 1.64 प्रतिशत थी. शोध के अनुसार, क्रीम में मौजूद रसायन खोपड़ी के माध्यम से खून में शामिल होकर गर्भाशय में पहुंच रहे हैं. 

कैसे हुई स्टडी
इस शोध के दौरान 33 हजार महिलाओं की राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थान द्वारा 10 सालों से अधिक समय तक निगरानी की गई. इसमें 35 से 74 साल के आयु वर्ग की महिलाएं शामिल थीं. अश्वेत महिलाओं में यह जोखिम दूसरों के मुकाबले ज्यादा था.