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Pollution And Myopia: कैसे वायु प्रदूषण बढ़ा रहा बच्चों में मायोपिया की समस्या? कैसे पीएम 2.5 कण भी है इसके लिए जिम्मेदार?

अगर बच्चों को सूरज की रोशनी नहीं मिलती है, तो आंखों का विकास कम होता है. वायु प्रदूषण के कारण उन्हें पूर्ण रूप से सूरज की रोशनी नहीं मिल पाती है. साथ ही पीएम 2.5 के कण आंखों में खुजली पैदा करते हैं, जिससे वह आंखों को बार-बार मसलते हैं और आंखे अंदर की तरफ दबती जाती है. इसका भी संबंध सीधा आंखों की सेहत के साथ है.

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अब तक माता-पिता बच्चों की नज़र कमजोर होने के पीछे सिर्फ़ मोबाइल, टीवी और लैपटॉप जैसे स्क्रीन को दोष देते रहे हैं. लेकिन अब आंखों की सेहत के लिए एक और छिपा दुश्मन तैयार हो गया है. यह है दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद, बेंगलुरु जैसे प्रदूषित शहरों में कम उम्र के बच्चों में तेज़ी से बढ़ती मायोपिया के मामलों का दिखना. जैसे-जैसे भारत में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है, वैसे-वैसे बच्चों की आंखों का प्राकृतिक विकास खतरे में पड़ रहा है.

पूर्वी एशिया में मायोपिया पहले ही बहुत बड़ी बीमारी बन चुकी है. विश्व स्वास्थ्य संगठन चेतावनी देता है कि 2050 तक दुनिया की आधी आबादी मायोपिया से प्रभावित हो सकती है, जिसमें पर्यावरण अहम भूमिका निभा रहा है. कम बाहरी खेलकूद और प्राकृतिक तेज़ रोशनी की कमी, दोनों ही प्रदूषण की वजह से, बच्चों में मायोपिया का जोखिम कई गुना बढ़ा देते हैं.

प्रदूषण बिगाड़ता है बच्चों की आंखों का विकास
आँखों के स्वस्थ विकास के लिए तेज़ दिन का रोशनी बेहद जरूरी है. इससे रेटिना में डोपामिन रिलीज़ होता है, जो आंख की लंबे होने की गति को नियंत्रित करता है. लेकिन स्मॉग और धुंध सूरज की रोशनी को रोकते हैं, जिससे बच्चों को आवश्यक प्रकाश नहीं मिलता. प्रदूषण बढ़ने से बच्चों तक पहुंचने वाली प्राकृतिक रोशनी घटती जा रही है. साथ ही वे बाहर भी कम जाते हैं, जिससे आंखों का विकास प्रभावित होता है.

सूजन, जलन और आंखों की सतह को नुकसान
PM2.5 और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड जैसे कण आंखों में जलन, सूखापन, लालपन बढ़ाते हैं. इससे बच्चे बार-बार आंखें रगड़ते हैं और मायोपिया होने की रफ्तार तेज़ हो जाती है. प्रदूषण के कारण बच्चे कम बाहर जाते हैं और ज़्यादा समय स्क्रीन पर बिताते हैं. ज्यादा देर तक ऐसे काम करना जिसमें नजदीक की नजर की जरूरत होती है, उसके कारण भी मायोपिया के चांस बढ़ते हैं.