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घुटनों के ट्रांसप्लांट से बचने का रास्ता? जानिए क्या कहता है आयुर्वेद

घुटनों में दर्द का मुख्य कारण हड्डियों के बीच मौजूद कार्टिलेज का घिस जाना होता है. जब यह कार्टिलेज धीरे-धीरे खत्म होने लगता है तो हड्डियां आपस में रगड़ खाने लगती हैं, जिससे दर्द, सूजन और चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है.

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आजकल घुटनों में दर्द की समस्या तेजी से बढ़ रही है. पहले यह परेशानी ज्यादातर बुजुर्गों में देखने को मिलती थी, लेकिन अब 50 से 60 साल के लोगों में भी घुटनों का दर्द आम हो गया है. कई मामलों में स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि डॉक्टर घुटनों का ट्रांसप्लांट कराने की सलाह दे देते हैं. हालांकि कुछ लोग सर्जरी से बचना चाहते हैं और इसके लिए आयुर्वेद का सहारा लेने के बारे में सोचते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आयुर्वेद में घुटनों के ट्रांसप्लांट का कोई विकल्प मौजूद है.

क्यों पड़ती है घुटनों के ट्रांसप्लांट की जरूरत
विशेषज्ञों के अनुसार घुटनों में दर्द का मुख्य कारण हड्डियों के बीच मौजूद कार्टिलेज का घिस जाना होता है. जब यह कार्टिलेज धीरे-धीरे खत्म होने लगता है तो हड्डियां आपस में रगड़ खाने लगती हैं, जिससे दर्द, सूजन और चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है. डॉक्टरों का कहना है कि पहले यह समस्या आमतौर पर 60 साल के बाद दिखाई देती थी, लेकिन अब बदलती जीवनशैली, मोटापा और कम शारीरिक गतिविधि के कारण कम उम्र के लोगों में भी यह परेशानी बढ़ रही है. जब कार्टिलेज काफी ज्यादा खराब हो जाता है और दवाओं या फिजियोथेरेपी से राहत नहीं मिलती, तब घुटनों के ट्रांसप्लांट की सलाह दी जाती है.

आयुर्वेद में कैसे देखा जाता है घुटनों का दर्द
आयुर्वेदिक विशेषज्ञों के अनुसार घुटनों और जोड़ों के दर्द का मुख्य कारण शरीर में वात दोष का बढ़ना माना जाता है. वात असंतुलित होने पर जोड़ों में दर्द, जकड़न और सूजन जैसी समस्याएं होने लगती हैं. विशेषज्ञ बताते हैं कि अगर घुटनों का कार्टिलेज पूरी तरह घिस चुका है तो उसे दोबारा बनाना संभव नहीं होता. लेकिन आयुर्वेदिक इलाज और सही जीवन शैली की मदद से दर्द और सूजन को काफी हद तक कम किया जा सकता है और बीमारी को आगे बढ़ने से रोका जा सकता है.

पंचकर्म थेरेपी से मिल सकती है राहत
आयुर्वेद में घुटनों के दर्द के लिए पंचकर्म थेरेपी को काफी प्रभावी माना जाता है. इसमें शरीर को डिटॉक्स करने और जोड़ों की समस्या कम करने के लिए विशेष उपचार किए जाते हैं. इस थेरेपी में जनु बस्ती नाम की प्रक्रिया भी की जाती है, जिसमें औषधीय तेल को घुटनों पर कुछ समय तक रखा जाता है. इससे जोड़ों में चिकनाहट बढ़ती है और दर्द व सूजन कम होने में मदद मिलती है. इसके अलावा स्टीम थेरेपी और औषधीय मालिश भी जकड़न कम करने में सहायक हो सकती हैं.

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