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आमतौर पर जोंक का नाम सुनते ही लोगों के मन में डर पैदा हो जाता है, लेकिन मध्य प्रदेश के रीवा में यही जोंक कई मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण बनकर सामने आई है. शासकीय आयुर्वेद अस्पताल में लीच थेरेपी यानी जोंक चिकित्सा के माध्यम से कई पुरानी और जटिल बीमारियों का उपचार किया जा रहा है. खास बात यह है कि इस तरीके से मरीजों को पॉजिटिव रिजल्ट मिल रहे हैं, जिसके चलते इसकी लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है.
जोंक शरीर के इंफेक्टिड हिस्से से इंफेक्टिड ब्लड को चूसती है और साथ ही ऐसे खास एंजाइम छोड़ती है, जो ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाने में मदद करते हैं. ये एंजाइम खून को जमने से रोकते हैं और इंफेक्शन के खतरे को भी कम करते हैं. इसी वजह से लीच थेरेपी को कई रोगों के उपचार में उपयोगी माना जाता है.
रीवा आयुर्वेद अस्पताल में लीच थेरेपी का उपयोग विभिन्न प्रकार की बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है. स्किन रोग, बवासीर, भगंदर, गंजापन, हर्पीज, ट्यूमर और गाउट जैसी समस्याओं में यह इलाज प्रभावी माना जा रहा है. विशेष रूप से त्वचा संबंधी रोगों में जोंक की लार में मौजूद हीरूडीन नामक एंजाइम महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. यह ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर बनाकर प्रभावित हिस्से को तेजी से ठीक होने में मदद करता है.
शासकीय आयुर्वेद अस्पताल के डीन एवं विशेषज्ञ चिकित्सक डॉ. दीपक कुलश्रेष्ठ के अनुसार अब तक 4,000 से अधिक मरीज इस चिकित्सा का लाभ उठा चुके हैं. उनका कहना है कि पहले लोग इस तरह के उपचार के लिए प्रयागराज या नागपुर जैसे शहरों का रुख करते थे, लेकिन अब रीवा में ही यह सुविधा उपलब्ध होने से मरीजों को काफी राहत मिल रही है. अस्पताल में प्रतिदिन करीब 10 से 12 मरीज लीच थेरेपी के लिए पहुंचते हैं.
इस चिकित्सा की एक और खासियत इसकी कम लागत है. लीच थेरेपी के लिए मरीजों से केवल 300 रुपये शुल्क लिया जाता है. उपचार के दौरान पूरी स्वच्छता और सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाता है, जिससे संक्रमण का खतरा न्यूनतम रहे.
इलाज में उपयोग की जाने वाली जोंकों को केरल, नागपुर, भोपाल और सूरत जैसे शहरों के खास ब्रीडिंग सेंटरों से मंगाया जाता है. चिकित्सा एक्सपर्ट्स बताते हैं कि एक मरीज के उपचार में इस्तेमाल की गई जोंक का दोबारा उपयोग नहीं किया जाता, जिससे स्वच्छता और सेफ्टी का ध्यान रखा जाता है.
इलाज शुरू करने से पहले रोग वाले हिस्से को अच्छी तरह साफ किया जाता है. जरूरत पड़ने पर त्वचा से खून की एक-दो बूंद निकालकर जोंक को उस स्थान पर लगाया जाता है. जोंक कुछ समय तक ब्लड चूसती है और इलाज पूरा होने के बाद इंफेक्टिड हिस्से पर हल्दी लगाकर पट्टी बांध दी जाती है. पूरी प्रक्रिया ट्रेंड चिकित्सकों की निगरानी में की जाती है, जिससे मरीज की सेफ्टी का पूरा ध्यान रखा जा सकता है.